लाॅकडाउन का असर : 30 साल से पढा़ रहे शिक्षक को गुजर – बसर के लिए करनी पड़ रही है मजदूरी

जैसे-जैसे समय आगे बढ़ता जा रहा है, वैसे-वैसे कोरोना वायरस का प्रभाव भी दिखता जा रहा है। कोरोना वायरस के कारण समाजिक और आर्थिक तौर पर काफी नुकसान हुआ है। जिसके कारण कई लोगों को अपनी नौकिरयां भी गंवानी पड़ी है। अब उन लोगों को पेट भरने के लिए काफी मेहनत मशक्कत करनी पड़ रही है। कुछ ऐसी ही कहानी केरल में रहने वाले 55 वर्षीय पालेरी मीथेल बाबू की है। जो लाॅकडाउन लगने के पहले एक हायर सेकंडरी काॅलेज में शिक्षक थे। लेकिन अब उन्हें मजदूरी कर अपना और अपने परिवार का गुजर-बसर करना पड़ रहा है।

पिछले 30 वर्षों से पढा़ रहा थे, अब मजबूरी में मजदूरी करनी पड़ रही है

55 वर्षीय मीथेल बाबू केरल के ओंचियाम में रहते हैं। मीथेल पिछले 30 वर्षों से बच्चों को पढा़ रहा रहे थे। लाॅकडाउन लगने के पहले Parallel College में हायर सेकंडरी के बच्चों को इंग्लिश पढ़ाते थे। लेकिन लाॅकडाउन लगने के कारण काॅलेज बंद हो गए। जिसके कारण मीथेल को अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा। इसके बाद मज़बूरी में मीथेल ने मई में कंस्ट्रक्शन साईट पर सुबह 7 बजे से 3 बजे तक काम करना शुरू किया। जहां उन्हें रोज के 750 रूपये मिलते है। मीथेल ने बताया कि कंस्ट्रक्शन का काम बहुत डल है, जिसके कारण मुझे सिर्फ 7 दिन ही काम मिला।

काफी संघर्ष के बाद पढ़ाई पूरी की थी मीथेल ने

मीथेल ने काफी संघर्ष के बाद अपनी पढ़ाई पूरी की थी। मीथेल एक गरीब परिवार में जन्मे थे। काफी संघर्ष करने के बाद मेथिल ने इंग्लिश में बीए किया, जिसके बाद वे चेन्नई चले गए। चेन्नई में मेथिल ने एक होटल में नौकरी की। चेन्नई में ही उन्होंने इंग्लिश पढ़ाना शुरू किया। थोड़े समय के बाद मेथिल को Parallel College में नौकरी मिल गई। जिसके बाद से अब तक मेथिल वहीं पर जाॅब कर रहे थे। लेकिन लाॅकडाउन लगने के कारण उन्हें अपनी नौकरी से हाथ धोना पड़ा।

लाॅकडाउन के दौरान कई स्टूडेंट्स ने भी मेथिल की मदद की

मेथिल के सिर पर ही उनके पूरे परिवार का जिम्मा है। मेथिल के परिवार में उनकी पत्नी और दो बेटे है। उनका बड़ा बेटा सिविल इंजीनियरिंग की पढ़ाई कर रहा है। जबकि छोटा बेटा 11वीं में पढ़ता है। इनकी पढ़ाई खर्चा भी मेथिल ही उठाते हैं। इन सबके अलावा मेथिल ने होम लोन भी ले रखा है। जिसकी किश्त भी भरनी होती है। मेथिल की नौकरी जाने के बाद लाॅकडाउन में कई स्टूडेंट्स ने उनकी मदद भी की और उन्हें राशन उपलब्ध कराया। मेथिल खुद भी मेहनत करना चाह रहे थे इसलिए वे पीछे नहीं हटे और मजदूरी कर रहे है।

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