दिल्ली में ''औषधालय बाॅक्स'' से फ्री में मास्क ले सकते हैं जरुरतमंद व्यक्ति

कोरोना वायरस से बचने के लिए आजकल हर कोई चेहरे पर मास्क लगाकर घूम रहा है। जिसके बाद मास्क की मांग बहुत बढ़ गई है। जिसके कारण बाजार में खराब गुणवत्ता वाले मास्क की सप्लाई भी बढ़ गई, जिसकी कई लोगों ने शिकायत भी की है। कुछ ऐसी ही घटना दिल्ली में रहने वाले सौरव दास के साथ भी हुई। जब वह पहला लाॅकडाउन लगने के बाद बाहर से मास्क खरीदकर घर पर आए तो उन्हें लगा कि ये मास्क उनकी सुरक्षा करेगा और वे आगे भी इसका इस्तेमाल कर सकेंगे। लेकिन जब उन्होंने वह मास्क उतारा तो मास्क बहुत खराब हो चुका था और आगे भी वे इसका उपयोग नहीं कर सकते थे।

मास्क की हालात देखकर सौरव की माँ लक्ष्मी दास बहुत नाराज दी थी। उन्होंने कहा ”इतनी खराब गुणवत्ता का मास्क और वो भी 3000 रु का हैं। इससे अच्छा मास्क मैं घर पर बना सकती हूं और वो भी इससे कम खर्च में।” जिसके बाद अगले दिन से लक्ष्मी दास ने घर पर ही मास्क बनाना शुरू किया और लगभग 25 मास्क बनाकर अपने आस-पास के श्रमिकों और दुकानदारों के बीच फ्री में वितरित किए। इसके बारे में उन्हें बहुत सकारात्मक प्रतिक्रियाएं मिली। जिसके बाद सौरव ने अपने आसपास पाँच “औषधालय” बाॅक्स स्थापित किए ताकि कोई भी सब्जीवाला, श्रमिक या अन्य कोई बिना मास्क के बाहर न जाए।

“औषधालय” बाॅक्स में से ले सकते हैं मास्क

मास्क बांटने के दौरान सौरव चाहते थे कि कम से कम संपर्क हो। इसके लिए सौरव ने एक ”औषधालय” बॉक्स डिज़ाइन किया जो एक सार्वजनिक शौचालय में रखे एक टीशू बॉक्स की तरह काम करता है। आप बॉक्स के बाहर लटका हुआ एक रिबन खींचते हैं और इस रिबन से एक मास्क जुड़ा होता है। जैसे ही व्यक्ति एक रिबन खींचेगा उससे जुड़ा मास्क बाहर आएगा, जो एक नए मास्क से जुड़ी होगी। इस बाॅक्स के ऊपर लिखा हैं ”धन्यवाद कृपया एक मास्क उठाए”

सौरव ने इसके बारे में और विस्तार से बताया “मेरे पास कोई धातु या प्लास्टिक के कंटेनर नहीं थे, इसलिए मैंने कार्डबोर्ड बॉक्स और चॉकलेट बाॅक्स को ले लिए जो चारों ओर पड़े थे। प्रत्येक बॉक्स को मैंने नीचे से काटा और उसके अंदर मास्क रखने की व्यवस्था की। प्रत्येक बॉक्स में पूरी क्षमता पर न्यूनतम 12 और अधिकतम 30 मास्क रखे हो सकते हैं।” इस बाॅक्स के जरिए सौरव स्थानीय बाजारों में दुकानदार, रिक्शा चालक और ऐसे अन्य मजदूर, जो डिस्पोजेबल या पुन: उपयोग करने योग्य मास्क खरीदने का जोखिम नहीं उठा सकते हैं। इन जैसे लोगों की मदद करना चाहते हैं।

पिछले दो महीनों में 1000 से भी ज्यादा मास्क वितरित कर चुके हैं दोंनों

सौरव और लक्ष्मी दास की जोड़ी पिछले दो महीनों में अब तक 1000 से भी ज्यादा मास्क बांट चुके है । लक्ष्मी ने कहा “मैं इस काम का आनंद लेती हूँ और मैं मेरी बेटियों के लिए हाथ से सूट और ब्लाउज बनाती थी। जिसका अभ्यास लॉकडाउन के दौरान मुझे काम आया। ” वे चाहती है कि सभी लोग घर का बना मास्क पहने। इन मास्क का लाभ सबसे ज्यादा उन लोगों को मिलना चाहिए जो इस चुनौतीपूर्ण समय में भी मास्क नहीं खरीद सकते हैं।

इसके आगे लक्ष्मी ने बताया ”सौरव का वह मुखौटा घर में मिलने के बाद, मैंने उसे ध्यान से देखा। यह एक जटिल डिजाइन का मुखौटा नहीं था। मैं आसानी से एक डबल स्तरित और उससे तीन गुना अच्छा मुखौटा बना सकती थी। मेरा भाई एक छोटी सी कार्यशाला चलाता है, जहाँ वह महिलाओं को लँगवाइवर्स सिलाई करना सिखाता है और वहाँ हमेशा कुछ अतिरिक्त सामान उपलब्ध होता है। इसलिए हमें उसकी दुकान से कपड़े का ढेर मिल गया और मुझे काम मिल गया।” लक्ष्मी का लक्ष्य 2000 से अधिक मास्क बनाकर बांटना हैं जिसे वें जल्द ही पूर करना चाहती हैं।


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