महाकाल मंदिर का सदियों पुराना इतिहास

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भारत देश अपनी संस्कृति और धार्मिक प्रथाओं के लिए विश्व भर में प्रसिद्ध है। जब भारतीय सभ्यता की शुरुआत हुई थी तब से यहां भगवान शिव की पूजा होती है। भारत में भगवान शिव के 12 ज्योतिर्लिंग स्थापित है जिनमे से एक भगवान महाकाल है। भगवान महाकाल अर्थात भगवान शिव जी का मंदिर मध्यप्रदेश राज्य के उज्जैन जिले में स्थित है। वेदों, पुराणों, महाभारत और कवि कालिदास की कई कृतियों में यहां का मनोहर वर्णन किया गया है। ऐसा माना जाता है कि भगवान महाकाल के दर्शन से मोक्ष की प्राप्ति होती है। कालिदास ने अपनी रचना मेघदूत में उज्जैनी की चर्चा करते हुए महाकाल मंदिर का वर्णन किया है। 1235 ई. में इल्तुतमिश द्वारा इस मंदिर को नष्ट कर दिया गया था। इसके बाद जो शासक इस राज्य में आए उन्हों ने मंदिर का पुनः जीर्णोद्धार करवाया और मंदिर आज अपने वर्तमान रूप में सुव्यवस्थित है।

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महाकाल मंदिर के इतिहास में नजर डाले तो, यहां 1107 से 1728 ई. तक यवनों का शासन था, इनके शासन कल में हिन्दुओं की प्राचीन सभ्यता वा परम्परा नष्ट हो चुकी थी। कुछ समय पश्चात् 1690 में मराठों ने मालवा क्षेत्र में आक्रमण कर विजय प्राप्त की और मालवा नगरी को अपनी राजधानी बनाई। मराठा शासन आने से महाकाल की प्रतिष्ठा और कीर्ति लौट आई। महाकाल की पुनः स्थापना हुई और मंदिर का निर्माण हुआ। साथ ही यहां के विशेष पर्वो और त्योहारों की शुरुआत हुई। उज्जैन में श्रावण मास के सभी सोमवार को श्रद्धालुओं की भीड़ होती है। महाकाल का अत्यंत प्रसिद्ध पर्व सिंहस्थ है। इस पर्व में श्रद्धालु क्षिप्रा नदी में स्नान कर भोले नाथ (महाकाल) भगवान के दर्शन करते है। महाकाल मंदिर की सुरक्षा व्यवस्था वा अन्य देखरेख के लिए एक प्रशासनिक समिति का गठन किया है। महाकाल मंदिर की एक विशेष बात यह है की यदि रात्रि में दर्शन करने कोई श्रद्धालु जाता है तो उसे पीले वस्त्र ही धारण करने होते है। मंदिर प्रांगण के अंदर सिद्धिविनायक गणेश जी की भी प्रतिमा स्थापित है।

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