नेपाल ने आधिकारिक तौर पर जारी किए नक्शे में भारत के हिस्से को दिखाया अपना हिस्सा

जहां एक तरफ पूरी दुनिया कोरोना महामारी की मार झेल रही है वहीं दूसरी तरफ नेपाल की तरफ से भारत और नेपाल के बीच बने अच्छे रिश्तों पर दरार डालने की कोशिश की जा रही है। हाल ही में नेपाल की सांसद ने नेपाल में आधिकारिक तौर पर अपडेटेड मैप जारी किया है जिसमें भारत के क्षेत्रों को नेपाल ने अपना हिस्सा बताया है जिस पर दोनों देशों के बीच विवाद खड़ा हो गया है।

नेपाल और भारत हमेशा से ही मित्र देश रहे हैं। ऐसे में नेपाल द्वारा उठाया गया यह कदम भारत नेपाल रिश्तों में खटास पैदा कर सकता है। नेपाल ने भारत के तीन हिस्सों लिंपियाधुरा, लिपुलेख और कालापानी को अपने अपडेटेड मैप में दर्शाया है। यह तीनों क्षेत्र उत्तराखंड राज्य के पिथौरागढ़ जिले के प्रशासन के अन्तर्गत आते हैं। कुल 335 वर्ग किलोमीटर इस क्षेत्र में भारत और नेपाल की बीच दशकों से विवाद चल रहा है।

इस पर भारतीय विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता अनुराग श्रीवास्तव ने भारत की ओर से जवाब देते हुए कहा कि, “नेपाल सरकार ने जो संशोधित नक्शा जारी किया है उसमे भारत के क्षेत्रों को शामिल किया गया है। ये एकतरफा कदम ऐतिहासिक तथ्य और सबूतों पर आधारित नहीं है। ये कूटनीतिक वार्ता के जरिए सीमा मामले को सुलझाने की द्विपक्षीय समझ के भी विपरित है। इस तरह कृत्रिम तौर पर किए गए भौगोलिक विस्तार को भारत स्वीकार नहीं कर सकता है।”

शुक्रवार 8 मई को भारत के गृहमंत्री राजनाथ सिंह द्वारा लिपुलेख पास पर बनाई गई 5 किलोमीटर लंबी रोड का उद्घाटन किया गया था। यह रोड कैलाश मानसरोवर की यात्रा के लिए सबसे सुगम मार्ग है। इस रोड के उद्घाटन के बाद से ही नेपाल सरकार द्वारा विवादित क्षेत्र को लेकर आपत्ति जताई जाने लगी थी और नेपाल में विरोध प्रदर्शन शुरू हो गए।

एक तरफ दुनिया के अमेरिका, ऑस्ट्रेलिया, इटली, यूनाइटेड किंगडम जैसे बड़े देश चीन को कोरोना वायरस फैलाने का जिम्मेदार ठहरा रहे हैं वहीं दूसरी तरफ नेपाल के प्रधानमंत्री केपी शर्मा ओली द्वारा दिए गए बयान में भारत को कोरोना वायरस का जिम्मेदार ठहराया गया है। ओली ने अपने बयान में कहा था कि इंडियन वायरस चीन और इटली के वायरस से भी खतरनाक है। ओली ने भारत पर आरोप लगते हुए कहा था कि भारत द्वारा हिमालयी राज्यों से अवैध रास्तों के जरिए कोरोना वायरस को नेपाल की सीमा में लाया जा रहा है। जिससे हमारे यहां संक्रमितों की संख्या में इजाफा हो रहा है।

भारत की ओर से दुनिया भर के तमाम देशों को पैरासिटामोल और हाइड्रॉक्सीक्लोरोक्विन दवाइयां बेची जा रही है वहीं भारत की ओर से नेपाल को यह दवाइयां मुफ्त दी गई थी। भारत के इस कदम के बावजूद नेपाल के प्रधानमंत्री का यह बयान निंदनीय है।

इतिहास पर एक नजर

इतिहास की बात करे तो 1962 में चीन से युद्ध के बाद के बाद से यह क्षेत्र भारत के लिए रणनीतिक रूप से महत्वपूर्ण है। इस क्षेत्र की सीमाएं तीन देशों भारत, नेपाल और चीन से मिलती हैं। 1962 से ही यह क्षेत्र भारत के नियंत्रण में है।

4 मार्च 1816 में नेपाल और ब्रिटिश ईस्ट इंडिया कंपनी के बीच हुई संधि के अनुसार दोनों देशों की सीमा को महाकाली नदी के उद्गम स्थल के द्वारा सीमांकित किया गया था। महाकाली नदी के पूर्वी तरफ नेपाल की सीमा और पश्चिम तरफ भारत की सीमा। लेकिन महाकाली नदी के उद्गम स्थल को लेकर भी दोनों देशों के बीच विवाद होता आ रहा है। नेपाल का कहना है कि महाकाली नदी का उद्गम स्थल लिंपियाधूरा है और भारत की ओर से लीपुलेक पास से महानदी का उद्गम माना जाता है।

सन् 1950 में भारतीय सेना की 17 यूनिट तैनात थी लेकिन नेपाल के विरोध के बाद सिर्फ़ काला पानी पर ही भारतीय सेना की 1 यूनिट तैनात रही। नेपाल के राजा महेंद्र भारत के साथ किसी भी प्रकार का विवाद नहीं चाहते थे इसलिए उन्होंने इस पर कोई आपत्ती नहीं जताई। नेपाल ने शुरुआत से ही भारत और चीन के रिश्तों के बीच संतुलन बनाए रखा। लेकिन 90 के दशक के बाद से जब नेपाल में सरकारें आने लगी तब कालापनी पर भारतीय सेना की तैनाती और विवादित क्षेत्र को नेपाल के अधीन करने के लिए विरोध किया जाने लगा। भारत ने इस क्षेत्र पर कभी भी अपना दावा नहीं छोड़ा।


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