लॉकडाउन में फंसे मजदूर चंपावत के क्वारंटाइन सेंटर में सीख रहे पढ़ना-लिखना

कोरोना वायरस के कारण इस वक्त देशभर में लॉकडाउन किया गया है। लोगों को अपने घर में रहने और बाहर न निकलने को कहा जा रहा है। हालांकि देश के अलग-अलग हिस्सों में काम करने वाले कुछ लोग ऐसे भी हैं जो अपने घर नहीं जा सके और जहां थे वहीं फंस गए। उत्तराखंड के चंपावत जिले में बने राहत केंद्रों में भी कई मजदूर रह रहे हैं, जो क्वारंटाइन के इस समय में कुछ अच्छा सीख रहे हैं। 55 साल के प्रताप बोरा नेपाल के कैलाली जिले के रहने वाले हैं। गरीबी के कारण वे कभी स्कूल नहीं जा सके और न ही पढ़-लिख सके। हालांकि लॉकडाउन ने उन्हें यह मौका दे दिया है। कोरोना वायरस के कारण क्वारंटाइन सेंटर में समय बिता रहे प्रताप बोरा ने सपने में भी नहीं सोचा होगा कि वे कभी कागज पेंसिल पकड़ पाएंगे और अब वे इस बात से खुश हैं कि आखिरकार उन्होंने हिंदी में अपना नाम लिखना सीख लिया है।

Coronavirus: Quarantined labourers learn to write for first time ...
Image Credit : Hindustan Times

‘पढ़ना-लिखना सीखना एक अलग अनुभव’

चेहरे पर मुस्कान लाते हुए बोरा बताते हैं, ‘मैंने अपनी पूरी जिंदगी में कभी कॉपी-पेंसिल नहीं पकड़ी। पहली बार मैंने लिखना सीखा है। पढ़ना-लिखना सीखना मेरे लिए बिल्कुल अलग तरह का अनुभव था। अब मैं किसी भी कागज पर हिंदी में दस्तखत कर सकता हूं। ऐसा लग रहा है जैसे मुझे कोई नई ताकत मिल गई है।’ बोरा अपना नाम लिखना तो सीख ही चुके हैं, साथ ही वे अपने गांव का नाम भी लिख लेते हैं। इस काम में उनकी मदद की है उत्तराखंड के चंपावत जिले के टनकपुर इलाके में बने राहत केंद्रों के सरकारी शिक्षकों ने। बोरा मजदूरी करते हैं फिलहाल वे टनकपुर से 55 किलोमीटर दूर पिथौरागढ़ रोड पर धौन इलाके में नेशनल हाईवे के कॉन्ट्रैक्टर के साथ काम कर रहे थे। लॉकडाउन की घोषणा के बाद वे अपने दूसरे साथियों के साथ नेपाल जा रहे थे, लेकिन भारत-नेपाल सीमा सील होने के कारण वे सरहद पार नहीं कर सके और स्थानीय प्रशासन ने उन्हें एक स्कूल में बने राहत शिविर में पहुंचा दिया।

कई मजदूरों ने सीखा अपना नाम लिखना

बोरा की तरह ही प्रहलाद ने भी कभी स्कूल का मुंह नहीं देखा। 36 साल के प्रहलाद उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के रहने वाले हैं और दिहाड़ी मजदूर का काम करते हैं। प्रहलाद भी अब अपने नाम के साथ-साथ कई दूसरी चीजों के नाम लिखना सीख गए हैं। प्रहलाद कहते हैं, ‘अगर मैं स्कूल गया होता तो मजदूर कभी नहीं बनता। अब वक्त निकल गया है, लेकिन पढ़ना-लिखना सीखने से मुझे नई ताकत मिली है। मैं अपने बच्चों को स्कूल जरूर भेजूंगा।’ बरेली के रहने वाले 25 साल के फैजान नेपाल में राजगीर का काम करते हैं। लॉकडाउन में बस या अन्य साधन न मिलने के कारण वे अपने साथियों के साथ पैदल ही बरेली के लिए निकल पड़े, लेकिन पुलिस ने उन्हें चंपावत के बनबसा इलाके में ही रोक दिया और क्वारंटाइन सेंटर भेज दिया। फैजान कहते हैं, ‘मैंने यहां दस्तखत करना सीखा है और यह मेरे लिए रोमांचकारी अनुभव है। अब मैं मजदूरी लेते वक्त अगूंठा लगाने के बजाय कागज पर दस्तखत करूंगा।’ फैजान की तरह ही इकबाल, मोहम्मद, शाहिद और रामनाथ बीर बहादुर जैसे कई मजदूर चंपावत में बने राहत केंद्रों में बुनियादी शिक्षा हासिल कर रहे हैं।

दस केंद्रों में चलाई जा रहीं साक्षरता कक्षाएं

चंपावत के जिलाधिकारी एसएन पांडेय बताते हैं, ‘हमने टनकपुर, बनबसा, चंपावत और लोहाघाट में ऐसे दस केंद्र बनाए हैं। साक्षरता की यह पहल सिर्फ हमारे जिले में की गई है। भारत और नेपाल के कई हिस्सों में रहने वाले मजदूर चंपावत में खनन, भवन निर्माण और सड़क निर्माण के कामों में लगे हैं। साक्षरता की इस पहल से निरक्षर लोगों को बुनियादी शिक्षा मिल सकेगी।’ उन्होंने बताया कि ये मजदूर अपने घर-परिवार से दूर हैं। ऐसे में हम यह कोशिश भी कर रहे हैं कि इन्हें परेशानी और तनाव से दूर रखा जाए और अलग-अलग तरह की गतिविधियों से इनका ध्यान बंटाया जाए।

योग और ध्यान से दूर किया जा रहा तनाव

टनकपुर के राहत केंद्र की प्रभारी और शिक्षिका प्रेमा ठाकुर बताती हैं, ‘टनकपुर इलाके के एक स्कूल में बने राहत केंद्र में 48 भारतीय और नेपाली नागरिकों को क्वारंटाइन में रखा गया है। इन लोगों को व्यस्त रखने और इनका तनाव दूर करने के लिए यहां योग और ध्यान की कक्षाएं भी चलाई जा रही हैं।’ उन्होंने बताया कि उच्च अधिकारियों के आदेश पर यहां साक्षरता की कक्षाएं भी चलाई जा रही हैं। मजदूरों को लिखने-पढ़ने के लिए पेंसिल और कागज भी उपलब्ध कराए जा रहे हैं और वे इसमें खासी दिलचस्पी भी दिखा रहे हैं। प्रेमा बताती हैं, ‘शुरुआत में ये लोग इस कक्षा में हिस्सा लेने और कागज-पेंसिल पकड़ने में झिझक महसूस कर रहे थे, लेकिन बाद में दिलचस्पी दिखाने लगे। ये लोग अपना नाम लिखना सीख गए हैं और इस बात को लेकर काफी खुश भी हैं।’

शिक्षा का महत्त्व समझाने की कोशिश

चंपावत के मुख्य शिक्षा अधिकारी आरसी पुरोहित बताते हैं, इसी तरह की साक्षरता कक्षाएं बनबसा, चंपावत और लोहाघाट के राहत केंद्रों में भी चलाई जा रही हैं। कुछ केंद्रों में पढ़ाई के लिए ब्लैकबोर्ड भी इस्तेमाल किए जा रहे हैं। इतने कम समय में ज्यादा कुछ तो पढ़ाया नहीं जा सकता, लेकिन इन लोगों को पढ़ाई का महत्त्व जरूर समझाया जा सकता है। बता दें कि हजारों मजदूर चंपावत की शारदा और लधिया नदी में खनन और सड़क निर्माण के काम में लगे हैं। लॉकडाउन के कारण ये मजदूर अपने घर नहीं जा सके और उन्हें राहत केंद्रों में भेज दिया गया। ऐसे में यहां रहना इन मजदूरों के लिए लाभकारी साबित हो रहा है और वे जिंदगी का नया अनुभव हासिल कर रहे हैं।


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