चीन ने रूसी शहर व्लादिवोस्तोक पर किया दावा, कभी चीन का ही हिस्सा था यह शहर

Vladivostok Urban Development Strategy - Connecting Cities EU
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कोरोना वायरस फैलाने के लिए पूरी दुनिया में चीन की आलोचना हो रही है। कई बड़े देश चीन को यह वायरस फैलाने का दोषी मानते हुए उसके खिलाफ सख्त कार्रवाई करने की बात कर रहे हैं। इसके अलावा हाल ही में भारत के साथ गहराए सीमा विवाद में भी चीन को अपने कई सैनिक गंवाने पड़े, इसके बावजूद वह हिमाकतें करने से बाज नहीं आ रहा है। वियोन की खबर के मुताबिक, चीन ने अब रूस के शहर व्लादिवोस्तोक पर अपना दावा ठोक दिया है। भारत स्थित रूसी दूतावास ने शुक्रवार को जापान के समुद्र के गोल्डन हॉर्न बे में रूसी सैन्य चौकी व्लादिवोस्तोक को स्थापित करने को लेकर एक वीडियो ट्वीट किया था। इस ट्वीट में कहा गया है कि इस सैन्य चौकी को मई 1880 में एक शहर का दर्जा दिया गया।

पहले चीन का ही हिस्सा था व्लादिवोस्तोक

इसी तरह का एक वीडियो बीजिंग स्थित रूसी दूतावास की ओर से चीन की माइक्रोब्लॉगिंग साइट वीबो पर पोस्ट किया गया। हालांकि इस पोस्ट को चीन के लोगों ने पसंद नहीं किया, क्योंकि वहां के सोशल मीडिया यूजर्स ने रूस के खिलाफ ऑनलाइन अभियान शुरू किया था। राज्य के स्वामित्व वाले सीजीटीएन नेटवर्क के पत्रकार शेन शिवेई ने कहा कि रूसी दूतावास के ट्वीट को ज्यादा लोगों ने पसंद नहीं किया, क्योंकि व्लादिवोस्तोक शहर पहले चीन के हेई शेन वेई क्षेत्र में आता था। इसे रूस ने बीजिंग की एकतरफा संधि के जरिए छीन लिया था। इसी तरह की भावनाएं चीन के दूसरे राजदूतों ने भी जताईं, जिनमें पाकिस्तान में चीन के राजनयिक भी शामिल हैं।

1860 में रूस को सौंपा गया था कब्जा

1856 से 1860 के बीच हुए दूसरे अफीम युद्ध में चीन को ब्रिटेन, रूस और फ्रांस के हाथों करारी हार मिली। युद्ध खत्म होने के बाद रूसी साम्राज्य ने प्रिमोर्स्की क्राय और व्लादिवोस्तोक क्षेत्र पर कब्जा जमा लिया। व्लादिवोस्तोक चीन के किंग राजवंश का ही एक हिस्सा था और 1860 में पेकिंग की संधि के तहत इसे रूस को सौंप दिया गया था। हालांकि यह कब्जा पूरी तरह से कानूनी था, लेकिन विस्तारवादी रवैये वाली चीन की कम्युनिस्ट पार्टी (सीसीपी) अब इस संधि को एकतरफा बताकर खारिज कर रही है। व्लादिवोस्तोक के अलावा चीन ने कॉवलून प्रायद्वीप को भी ब्रिटेन के हाथों खो दिया है। सोशल मीडिया पर दिख रहा चीन का गुस्सा 160 साल पहले मिली हार का ही नतीजा है।

कोरोना वायरस ने दुनिया से बिगाड़े चीन के रिश्ते

ऐसे वक्त में जब वुहान से निकले कोरोना वायरस के कारण दुनिया के बड़े देशों से चीन के रिश्ते खराब हो रहे हैं, तो उसका करीबी सहयोगी रूस भी उसके खिलाफ हो गया है। यह सब भी तब हुआ जबकि रूस ने अभी तक चीन को न तो कोरोना वायरस फैलाने का जिम्मेदार ठहराया है और न ही हांगकांग में मानवाधिकार उल्लंघन का। ऐसे में व्लादिवोस्तोक की स्थापना का जश्न मनाने वाले भारत स्थित रूसी दूतावास के ट्वीट को एक बड़े रणनीतिक संकेत के रूप में देखा जा रहा है। इस ट्वीट ने भारत और चीन के बीच जारी सीमा विवाद के बीच यह ट्वीट इसलिए भी अहम है क्योंकि इसने भारत और रूस के बीच की रणनीतिक साझेदारी को उजागर किया है।

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रूस की 160,000 वर्ग किमी जमीन पर चीन का दावा

रूस और चीन के बीच 4209 किलोमीटर लंबी सीमा है। रिपोर्टों के मुताबिक रूस का रक्षा मंत्रालय आने वाले समय में चीन की ओर से पैदा की जाने वाली चुनौतियों को लेकर सतर्क है। विशेषज्ञों का मानना है कि रूस के जश्न पर चीन का ऐतराज सोशल मीडिया से ज्यादा नहीं बढ़ सकता। 1969 में दोनों देश युद्ध के कगार पर थे, लेकिन 2008 में दोनों में समझौता हो गया। इस समझौते के तहत रूस ने अमुर और उसुरी नदियों के कुछ द्वीप चीन को सौंप दिए। हालांकि तब भी व्लादिवोस्तोक की यथास्थिति में कोई बदलाव नहीं हुआ। कथित तौर पर, चीन ने कई आपसी समझौतों का उल्लंघन करते हुए रूस में लगभग 160,000 वर्ग किमी जमीन पर दावा किया है।

21 देशों की जमीन पर चीन का अवैध कब्जा

वियोन की खबर के मुताबिक, चीन ने 21 देशों की जमीन पर अवैध रूप से कब्जा जमा रखा है। यहां तक कि अंतर्राष्ट्रीय अदालत ने भी चीन के झूठे दावों को खारिज कर दिया है, लेकिन फिर भी वह फिलीपींस के द्वीपों पर भी मालिकाना हक जमाता है। कुछ ऐसा ही हाल वियतनाम का भी है। चीन ने इंडोनेशियाई क्षेत्र के द्वीपों के पास पानी में मछली पकड़ने के अधिकार पर भी अपना दावा पेश किया है। इसके अलावा चीन का 2001 से लाओस, कंबोडिया की ऐतिहासिक मिसालों और थाईलैंड के साथ मेकांग नदी को लेकर विवाद चल रहा है। चीन का सेनकाकू और रयु क्या द्वीप को लेकर जापान के साथ भी विवाद चल रहा है। इस विस्तारवादी देश ने कई मौकों पर पूरे दक्षिण कोरिया पर भी दावा किया है। इसके अलावा, कम्युनिस्ट संचालित देश का उत्तर कोरिया के साथ पेक-टू और टूमन नदी को लेकर भी विवाद जारी है। इससे पहले खबरें आईं थी कि चीन ने नेपाल के गोरखा जिले में रुई गांव पर भी कब्जा कर लिया है।

अपने ही लोगों के असंतोष से डरता है चीन

लद्दाख में शिक्षा के क्षेत्र में सराहनीय बदलाव लाने वाले सोनम वांगचुक ने कुछ दिनों पहले बताया था कि चीन की निरंकुश सरकार अपने उन 140 करोड़ लोगों से डरती है, जो बिना किसी मानवाधिकार के बंधुआ मजदूरों की तरह सरकार के लिए काम करते हैं। उसे डर है कि लोगों में फैला असंतोष कम्युनिस्ट शासन के खिलाफ विद्रोह पैदा कर सकता है। कोरोना वायरस के बीच चीन को अपने कारखाने बंद करने पड़े। वहां बेरोजगारी दर 20 फीसदी तक बढ़ गई है। इसीलिए चीन ने अपने पड़ोसी देशों के प्रति दुश्मनी भरा रवैया अख्तियार कर रखा है ताकि देश को एकजुट रखा जा सके। उन्होंने बताया कि 1962 का भारत-चीन युद्ध भी तत्कालीन चीनी सरकार की रणनीतियों का ही हिस्सा था। इसका मकसद 1957 से 1962 के बीच फैले अकाल से निपटने में सरकार की नाकामी से जनता का ध्यान हटाना था। वांगचुक ने कहा कि चीन की निरंकुश सरकार यह जानती है कि अगर सकल घरेलू उत्पाद (जीडीपी) या देश की समृद्धि में कमी आती है, तो बड़े पैमाने पर विद्रोह हो सकता है।


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