कोरोना के रियल हीरो, जान जोखिम में डालकर अकेले ही उठाते हैं बायोमेडिकल कचरा

देशभर में कोरोना वायरस से संक्रमित लोगों की तादाद तरीब 14676 हो गई है। यह महामारी और न फैलने पाए, इसके लिए मेडिकल सेक्टर के लोग दिन-रात काम कर रहे हैं। डॉक्टर, नर्स, पैरा मेडिकल स्टाफ व केमिस्ट के अलावा भी कई लोग ऐसे हैं जो कोरोना के खिलाफ जारी लड़ाई में बहुत बड़ी भूमिका निभा रहे हैं, लेकिन इनके बारे में बहुत कम लोग जानते हैं। आज हम आपको ऐसे ही एक कोरोना वॉरियर के बारे में बताने जा रहे हैं जो अपनी जान जोखिम में डालकर इस लड़ाई में अपना योगदान दे रहे हैं। इस कोरोना वॉरियर का नाम है संजय देहुरी। वे भुवनेश्वर, एम्स में काम करते हैं। यहां के दूसरे कर्मचारियों ने जहां बायोमेडिकल कचरे से होने वाले संभावित खतरे के डर से इसे इकट्ठा करने से इनकार कर दिया, वहीं संजय ने साहस दिखाया और इस काम की जिम्मेदारी ली। वे अकेले इस कचरे को इकट्ठा करते हैं और उसे नष्ट भी करते हैं।

Sanjay Dehury was admitted to AIIMS Bhubaneswar after testing positive for Covid-19.
Image Credit : Hindustan Times

अकेले ही उठाया सफाई का बी़ड़ा

21 साल के संजय ओडिशा के भुवनेश्वर में बने एम्स में बतौर हाउसकीपिंग स्टाफ काम करते हैं। वह अपनी जान की परवाह किए बगैर अस्पताल से रोजाना निकलने वाले बायोमेडिकल कचरे को बाहर ले जाने और उसे सही तरीके से नष्ट करने का काम कर रहे हैं। कोरोना के मरीजों के इलाज में इस तरह का कचरा रोज ही पैदा हो रहा है। वह इस अस्पताल के एकमात्र ऐसे कर्मचारी हैं जो यह काम कर रहे हैं। कचरे से होने वाले संभावित संक्रमण के डर से बहुत से लोग यह काम करने से कतरा रहे थे, लेकिन संजय ने डरने के बजाय हिम्मत दिखाई और अकेले ही इस काम में जुट गए। उन्होंने अक्टूबर 2019 में एम्स, भुवनेश्वर के 250 कर्मचारियों वाले हाउसकीपिंग डिपार्टमेंट में काम करना शुरू किया। इससे पहले वे बारात व अन्य समारोहों में गाड़ी चलाने का काम करते थे।

दूसरे कर्मचारियों ने संक्रमण के डर से नहीं किया काम

कोरोना वायरस की रोकथाम के लिए पूरे देश में लॉकडाउन की घोषणा होने के बाद एम्स की साफ-सफाई का काम देखने वाली कंपनी गोल्डन हॉस्पिटैलिटी लिमिटेड के फेसिलिटी मैनेजर मनोज साहू ने संजय को बायोमेडिकल कचरा इकट्ठा करने और उसे अस्पताल में बने डिस्पोजल सेंटर में ले जाने का जिम्मा सौंपा। साहू ने अपने 18 कर्मचारियों को यह काम करने के लिए चुना। शुरू में दस लोगों ने इस काम को करने की हामी भरी, लेकिन अंत में सिर्फ संजय ही राजी हुए। एम्स भुवनेश्वर के एडिशनल मेडिकल सुपरिटेंडेंट प्रवास त्रिपाठी कहते हैं कि उन्हें संजय पर नाज है। उन्होंने कहा, ‘हाउसकीपिंग स्टाफ के कई कर्मचारियों ने संक्रमण के डर से इस काम को करने से इनकार कर दिया, जबकि हमने उन्हें बहुत समझाया कि अगर वे सावधानी बरतेंगे तो संक्रमण का कोई खतरा नहीं हैं। लेकिन केवल संजय ने यह जोखिम उठाया।’

काम के पहले दिन हुई थी घबराहट

भुवनेश्वर के पास एक गांव में अपने पिता और एक भाई के साथ रहने वाले संजय बताते हैं, ‘हाउसकीपिंग स्टाफ के दूसरे कर्मचारियों ने डर के कारण इस कचरे को उठाने से मना कर दिया। उन्होंने कहा कि इससे उन्हें भी संक्रमण हो सकता है। ड्यूटी के पहले दिन मैं भी बहुत घबराया हुआ था क्योंकि मेरे दूसरे साथियों ने मुझे काम पर नहीं जाने को कहा था। इसके बाद अगले दो दिन तक मैं काम पर नहीं गया, लेकिन तीसरे दिन मैंने सोचा कि अगर मैं नहीं गया तो कोई और यह काम करेगा। इसलिए मैंने ड्यूटी ज्वाइन कर ली।’ अस्पताल के दूसरे कर्मचारियों की तरह संजय ने भी रोजाना काम पर आने के लिए लॉकडाउन पास बनवाया। वे रोज अपनी दोपहिया गाड़ी से अस्पताल आते-जाते हैं।

How a cleaner became Covid-19 wards’ waste collector in Odisha

घर पर भी सावधानी बरतते हैं संजय

संजय देहुरी महीने में करीब 12 हजार रुपए कमा लेते हैं। अस्पताल के एक अधिकारी के मुताबिक, अस्ताल प्रशासन संजय जैसे कर्मचारियों को प्रेरित करने के लिए उन्हें अतिरिक्त आर्थिक मदद देने की योजना बना रहा है। हालांकि अभी तक इस योजना को मूर्त रूप नहीं दिया गया है। अस्पताल प्रशासन ने परिसर में बने एक हॉस्टल में कोरोना के इलाज से जुड़े कर्मचारियों के रहने की व्यवस्था की है, जहां 6-7 नर्सें रहती हैं। संजय को भी यहां रहने को कहा गया था, लेकिन वे अपने परिवार के साथ ही रहना चाहते हैं। रोजाना अस्पताल से घर लौटने के बाद संजय अपने कपड़ों को डेटॉल वाले पानी और गर्म पानी में डुबोते हैं। इसके बाद वह खुद गर्म पानी से नहाते हैं। रात का खाना खाने के बाद संजय अपने घर के बाहर बने बरामदे में सोने के लिए चले जाते हैं। वह बताते हैं, ‘हमारे घर में सिर्फ एक कमरा है। अगर मैं कमरे में सो गया तो मेरे पिता व भाई को बरामदे में सोना पड़ेगा, क्योंकि वे मेरे साथ नहीं सो सकते। इसीलिए उनसे दूरी बनाने के लिए मैं बरामदे में सोता हूं।’

क्या होता है बायोमेडिकल कचरा

बायोमेडिकल कचरा अस्पतालों से निकलने वाला कचरा होता है, जिनमें कांच व प्लास्टिक की ग्लूकोज की बोतलें, इंजेक्शन और सिरिंज, दवाओं की खाली बोतलें व उपयोग किए गए आईवी सेट, दस्ताने और अन्य सामग्री होती हैं। इसके अलावा इनमें विभिन्न रिपोर्टें, रसीदें व अस्पताल की पर्चियां आदि भी शामिल होती हैं। इस कचरे को कहीं भी खुले में नहीं फेंका जा सकता क्योंकि इससे बीमारियां फैलने का खतरा होता है। इन्हें घरों से निकलने वाले सामान्य कचरे में भी नहीं मिलाया जाता, बल्कि अलग से नष्ट किया जाता है। नियम के अनुसार, इस कचरे के लिए अस्पतालों में काले, पीले, व लाल रंग के बैग होते हैं। ये बैग अलग तरीके से बनाए जाते हैं, इनकी पन्नी में एक तरह का केमिकल मिला होता है जो जलने पर नष्ट हो जाता है और दूसरे पॉलिथिन बैगों की तरह जलने पर सिकुड़ता नहीं है। इसीलिए इस बैग को बायोमेडिकल डिस्पोजेबल बैग भी कहा जाता है। विभिन्न प्रकार के बायोमेडिकल कचरे को अलग-अलग इकट्ठा करने वाले बैगों या डिब्बों को अलग-अलग रंग दिया जाता है, ताकि इनके निपटान में आसानी हो। लाल बैग में सिर्फ सूखा कचरा डाला जाता है जैसे- रुई, गंदी पट्टी, प्लास्टर आदि। पीले बैग में गीला कचरा, बायोप्सी, मानव अंगों का कचरा आदि डाला जाता है। इसी तरह से काले बैग में सुइयां, ब्लेड, कांच की बोतलें व इंजेक्शन आदि रखे जाते हैं। कोरोना वायरस के बारे में जैसा कि आप जानते हैं कि यह किसी-किसी सतह पर लंबे समय पर जिंदा रह सकता है। इसलिए इससे जुड़े कचरे के निपटारे में अतिरिक्त सावधानी बरती जा रही है।

ओडिशा में कोरोना वायरस के मामलों की बात करें तो यहां फिलहाल 38 संक्रमित मरीजों का विभिन्न अस्पतालों में इलाज चल रहा है। प्रदेश में शुक्रवार को और दो कोराना संक्रमित इलाज के बाद ठीक हो गए। दोनों स्वस्थ हुए मरीज भुवनेश्वर से ही हैं। जानकारी के मुताबिक, ओडिशा में अब तक कुल 60 संक्रमित मरीजों में से 21 कोरोना संक्रमित मरीज स्वस्थ हो चुके हैं, जबकि एक मरीज की मौत हुई है।


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