कोरोना वायरस का नया लक्षण है हैप्पी हाइपोक्सिया, जानिए क्यों है यह खतरनाक

बीते एक साल से दुनिया भर में फैली कोरोना महामारी ने न सिर्फ हमारी जिंदगी पटरी से उतार दी है, बल्कि इसके कारण कितने ही लोगों को बेवक्त अपनी जान गंवानी पड़ी। पिछले साल के मुकाबले महामारी की दूसरी लहर ज्यादा घातक साबित हो रही है। पिछले साल जब पहली बार कोरोना वायरस का मामला सामने आया था, तब सर्दी, खांसी, बुखार और स्वाद व गंध का पता न चलना जैसे लक्षण दिखे थे। कुछ गंभीर मामलों में भी निमोनिया, सांस फूलना या छोटी रक्त वाहिकाओं में थक्कों का बनना ही शामिल था। लेकिन इस बार कोरोना की दूसरी लहर में इस वायरस के लक्षण भी बढ़ते जा रहे हैं। इससे लोगों में भ्रम और चिंता बढ़ी है। कोरोना संक्रमण की वजह से लोगों में सर्दी, बुखार, गले में खराश के साथ ही ऑक्सीजन का लेवल गिरने लगता है, लेकिन दूसरी लहर में ऐसे मामले सामने आए हैं जिनमें कोई लक्षण नहीं था उसके बाद भी रिपोर्ट पॉजिटिव आई है। कई मामले ऐसे भी हैं जहां बिना किसी लक्षण के मरीज का ऑक्सीजन लेवल बहुत कम हो जाता है और उसे अस्पताल में भर्ती करना पड़ता है। इसकी एक मुख्य वजह है हैप्पी हाइपोक्सिया (Happy Hypoxia)। ये फेफड़ों को नुकसान पहुंचाता है, जिसके कारण शरीर का ऑक्सीजन लेवल काफी कम हो जाता है।

Woman in hospital bed
Image Credit : BBC

क्या है ‘हैप्पी हाइपोक्सिया’

यह कोरोना वायरस का नया लक्षण है। हाइपोक्सिया शब्द का अर्थ है- खून में ऑक्सीजन का लेवल बहुत कम हो जाना। एक स्वस्थ व्यक्ति के शरीर में सामान्य ऑक्सीजन लेवल 95 से 100 फीसदी के बीच होता है, लेकिन कोविड-19 से पीड़ित कुछ मरीजों में ऑक्सीजन लेवल करीब 40 फीसदी तक कम हो जाता है। शरीर में ऑक्सीजन का लेवल कम होने से कार्बन डाई ऑक्साइड का लेवल बढ़ जाता है। ऐसे में दिल का दौरा पड़ने या ब्रेन हेमरेज होने का खतरा बढ़ जाता है। हैप्पी हाइपोक्सिया के मामले में चिंता की बात यह है कि इसमें कोई भी बाहरी लक्षण दिखाई नहीं देता। इसका मतलब है कि कोरोना के शुरुआती दौर में मरीज खुश और स्वस्थ लगता है, लेकिन अंदर से उसके फेफड़े खराब होने लगते हैं।

हैप्पी हाइपोक्सिया की वजह

डॉक्टरों की मानें तो एक सामान्य व्यक्ति का ऑक्सीजन स्तर 95 से ऊपर होता है। मरीज के शरीर में संक्रमण होने से उसका ऑक्सीजन लेवल गिरता है, पर उसे इसका एहसास नहीं होता। इसी खुशफहमी की वजह से इसे हैप्पी हाइपोक्सिया कहा जाता है। ऑक्सीजन लेवल 70 से 80 तक पहुंचने पर भी मरीज को सांस लेने में परेशानी नहीं होती। हैप्पी हाइपोक्सिया का प्रमुख कारण फेफड़ों में खून की नसों में थक्के जम जाने को माना जाता है। इसकी वजह से फेफड़ों को पर्याप्त मात्रा में ऑक्सीजन नहीं मिल पाती और खून में ऑक्सीजन सेचुरेशन कम होने लगता है। विशेषज्ञों का कहना है कि हाइपोक्सिया की वजह से दिल, दिमाग, किडनी जैसे शरीर के प्रमुख अंग काम करना बंद कर सकते हैं।

युवाओं पर ज्यादा दिख रहा असर

हैप्पी हाइपोक्सिया युवाओं पर ज्यादा असर डाल रहा है। इसकी दो वजहें हैं- पहला, युवाओं की इम्युनिटी यानी प्रतिरोधक क्षमता मजबूत होती है। दूसरा, उनकी सहनशक्ति भी दूसरे लोगों से ज्यादा होती है। बुजुर्गों का ऑक्सीजन लेवल 94 से 90 के बीच आने पर भी उन्हें परेशानी होने लगती है, लेकिन इसके उलट युवाओं को 80 फीसदी ऑक्सीजन सेचुरेशन पर भी लक्षण महसूस नहीं होते। यानी वे कुछ हद तक हाइपोक्सिया को सहन कर जाते हैं। युवाओं को दफ्तर या व्यवसाय के लिए घर से ज्यादा बाहर निकलना पड़ रहा है, इसीलिए वे वायरस से ज्यादा संक्रमित हो रहे हैं। इससे युवाओं में संक्रमण के लक्षण गंभीर हो रहे हैं। हालांकि अब भी वायरस से सबसे ज्यादा खतरा बुजुर्गों और कम इम्युनिटी वाले लोगों को ही है।

कैसे करें इसकी पहचान

हैप्पी हाइपोक्सिया के शिकार मरीजों के होठों का रंग बदलने लगता है यानी होंठ हल्के नीले होने लगते हैं। इसके अलावा त्वचा का रंग भी लाल या बैंगनी होने लगता है। बिना कोई मेहनत वाला काम किए अगर गर्मी न हो तो भी लगातार पसीना आता है। ये सभी खून में ऑक्सीजन सेचुरेशन कम होने के लक्षण हैं। इसलिए लक्षणों पर लगातार ध्यान देना चाहिए और जरूरत पड़ने पर तुरंत अस्पताल में भर्ती कराना चाहिए।

कैसे कर सकते हैं बचाव

विशेषज्ञों के मुताबिक, कोरोना की दूसरी लहर में हैप्पी हाइपोक्सिया के कारण करीब पांच फीसदी मौतें हुई हैं। शरीर के ऑक्सीजन लेवल की जांच करके इस हालत से बचा जा सकता है। डॉक्टरों और विशेषज्ञों की राय के मुताबिक, कोरोना मरीजों को समय-समय पर शरीर के ऑक्सीजन लेवल की जांच करते रहनी चाहिए। हैप्पी हाइपोक्सिया से बचने का यही सबसे अच्छा तरीका भी है। इसलिए बेहतर है कि आप किसी खुशफहमी में न रहें कि आपको सांस लेने में कोई दिक्कत महसूस नहीं हो रही है तो ऑक्सीजन लेवल की जांच क्यों करें, बल्कि यह बेहद ही जरूरी है। किसी भी तरह की समस्या होने पर डॉक्टर से सलाह जरूर लें।


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