आँखों में कलेक्टर बनने का सपना लिए ऑनलाइन क्लास लेने रोज़ाना चढ़ते हैं पहाड़

आँखों में कलेक्टर बनने का सपना लिए ऑनलाइन क्लास लेने रोज़ाना चढ़ते हैं पहाड़ | सूचना
Image Credit: The Better India

सातवीं कक्षा में पढ़ने वाले 12 वर्षीय हरीश रोजाना अपने गाँव के पहाड़ पर चढ़ते हैं। ऐसा वे ऑनलाइन चल रही क्लास अटेंड करने के लिये पिछ्ले 35 दिन से रोजाना 15 मिनट की चढ़ाई करते हैं। दरअसल उनके गाँव में नेटवर्क की समस्या होने के कारण वे पहाड़ पर चढ़ते हैं, ताकि उन्हें पर्याप्त नेटवर्क कवरेज मिल सके।

जवाहर नवोदय विद्यालय में पढ़ने वाले हरीश राजस्थान के पचपदरा गाँव के रहने वाले हैं। वे रोजाना पुस्तकों के साथ-साथ टेबल, कुर्सी और स्मार्टफ़ोन ले कर चढ़ाई के लिये सुबह 7:20 पर अपने भाई के साथ घर से निकलते हैं, ताकि क्लास लेने में देरी न हो जाये। हरीश को क्लास लेने से रोकने के प्रयास में तेज गर्मी और बरसात भी विफल रहे हैं।

हरीश का कहना है, “मैं किसी भी विषय की कक्षा छोड़ना नहीं चाहता। हाँ, लॉकडाउन ने काफी तरीकों से हम सभी के लिए चीजों को कठिन बना दिया है, लेकिन हमें इस बदलाव को स्वीकार कर एक रास्ता खोजने की जरूरत है। अब यह मेरे लिये सामान्य हो गया है।”

हरीश विज्ञान पढ़ना चाहते हैं और संघ लोक सेवा आयोग की परीक्षा में शामिल होने की इच्छा रखते हैं। इस पर उन्होंने कहा, “मुझे नहीं पता कि मैं क्रांतिकारी बदलाव ला सकता हूँ या नहीं, लेकिन मैं देश के दूरदराज क्षेत्रों में प्रौद्योगिकी और अन्य सुविधाओं को सुलभ और सस्ती बनाना चाहता हूँ। कोरोना वायरस के दौरान देश के गरीबों की दुर्दशा को देखकर मैंने महसूस किया है कि नौकरशाहों में विभिन्न नीतियों के माध्यम से बदलाव लाने की शक्ति है।”

क्षेत्रीय पत्रकार जब एक खदान पर गए थे तब उन्होंने हरीश को देखा। उनकी कहानी सोशल मीडिया पर शेयर की गई और यह जल्द ही वायरल हो गई। पूर्व क्रिकेटर वीरेंद्र सहवाग ने भी ईमानदारी और प्रतिबद्धता के लिए ट्वीट कर उनकी सराहना की। उन्होंने लिखा, “राजस्थान के बाड़मेर का हरीश रोज एक पहाड़ पर चढ़ता है, ताकि वह इंटरनेट का उपयोग कर ऑनलाइन कक्षाओं में भाग ले सके। वह सुबह 8 बजे चढ़ता है और कक्षा समाप्त होने के बाद दोपहर 2 बजे घर लौटता है। उसका समर्पण प्रशंसनीय है। मैं उसकी मदद करना चाहता हूँ।”

हरीश के पिता वीरम एक खेत में मजदूरी करते हैं लेकिन उन्हें लगता है कि गाँवों में ऑनलाइन शिक्षा एक लक्जरी है। उन्होंने कहा, “मेरा बेटा पढ़ाई में रुचि रखता है और अच्छे नम्बर लाता है। अफसोस की बात यह है कि हमारे यहाँ अच्छा मोबाइल नेटवर्क नहीं है लेकिन मुझे यह देखकर गर्व होता है कि हरीश अपनी कक्षाओं को न लेने के बहाने कभी नहीं बनाता।”

ग्रामीण क्षेत्रों के विद्यार्थियों के बारे में चिंता व्यक्त करते हुए उन्होंने कहा, “हम दो वक्त के भोजन का प्रबंध मुश्किल से करते हैं और अब हमें इंटरनेट कनेक्शन के लिये अतिरिक्त खर्चा वहन करने की चिंता रहेगी। इस संकट से निपटने के लिये स्कूल या फिर सरकार को चाहिए कि स्थिति सामान्य होने तक हमें मुफ्त डेटा उप्लब्ध कराये। मेरे बेटे के पास एक स्मार्टफ़ोन है लेकिन कई माता-पिता आर्थिक संकट के कारण बच्चों को यह सब उप्लब्ध नहीं करा सकते।

गौरतलब है कि भारत के कई घरों में इंटरनेट का उपयोग विशेष सुविधा है क्योंकि आंकड़ों के अनुसार 2020 में भी इंटरनेट के उपयोग की दर केवल 50 प्रतिशत है। भले ही देश की 66% आबादी गाँवों में रहती है लेकिन ग्रामीण क्षेत्रों में इंटरनेट का उपयोग सिर्फ 25.3% ही है जबकी शहरी क्षेत्रों में 97.9% है।

भारत में शिक्षा वैश्विक महामारी के कारण नुकसान भुगत रहा है जो बच्चों के भविष्य को खतरे में डाल रहा है। आजीविका के नुकसान ने इस समस्या को और बढ़ा दिया है क्योंकि कमजोर आर्थिक पृष्ठभूमि के अधिकांश माता-पिता स्मार्टफोन का खर्च वहन नहीं कर सकते हैं। ऐसे में सरकार और शिक्षाविदों को एक साथ आ कर ऐसा समाधान तैयार करने की आवश्यकता है जो बच्चों के भविष्य को सवारने के साथ-साथ माता-पिता को भी ऋण के बोझ से बचा सके।


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