कोरोना काल में नये दृष्टिकोण के साथ बदलते छोटे व्यवसाय- फूलवाले की मालाएं और पुतला

कोरोना काल में नये दृष्टिकोण के साथ बदलते छोटे व्यवसाय- फूलवाले की मालाएं और पुतला | सूचना
Image credit: Hindustan Times

मोहम्मद सादिक फूलों का व्यवसाय करते हैं। यूँ तो वह दो बच्चों के वालिद हैं और उनकी उम्र 29 वर्ष है लेकिन दिखते किसी किशोर की उम्र के हैं। कोरोनावायरस की वजह से उनके फूल के व्यवसाय ना के बराबर रह गया था लेकिन सादिक ऐसे व्यक्ति नहीं हैं जो बिना कुछ किये बैठे रहें और शिकायत करते रहें। उन्होंने गुणा-हिसाब लगा कर अपने व्यवसाय में कुछ नया करने की सोचा जिससे लॉकडाउन में उन्हें आर्थिक तंगी का सामना ना करना पड़े।

आज मोहम्मद सादिक की सेंट्रल दिल्ली में दुकान रूपी छोटे से फुटपाथ स्टॉल पर एक नया लड़का है। उसने ना ही कपड़े पहन रखे हैं ना ही अपना सिर लगया हुआ है। दरअसल वह एक सफेद रंग का पुतला है। सिर्फ धड़ है। सादिक उसे दुकान के बाहर रख कर कपड़े पहना रहे हैं। सादिक ने उसे करोल बाग से खरीदा है पूरे 900 रुपए चुका कर ताकि उसकी मदद से कुछ और रुपए कमा सकें। ये कहना गलत नहीं होगा कि यह पुतला फूलवाले के इन विपरीत परिस्थितियों को पार करने में दृढ़ संकल्प का प्रतीक है।

सादिक से उनके नये व्यवसाय के बारे में पूछने पर वह निराशाजनक उत्तर को भी आश्चर्यजनक रूप से एक मोहक मुस्कुराहट के साथ देते हुए कहते हैं, “फूलों का व्यवसाय आधे से भी नीचे आ गया है।” वास्तव में, सादिक फूलों के गुल्दस्ते नहीं बेचते हैं बल्कि पूरे दिन फूलों को मालाओं और गजरों में पिरो कर बेचते हैं। उन्होंने बताया कि अधिकतर उनकी कमाई शादियों में प्रमुख रूप से इस्तेमाल होने वाली मालाओं से होता था, जिसमें अलग-अलग धनराशि के नोटों के साथ गुलाब पिरोये जाते हैं। कोरोनावायरस काल के पहले उनका अच्छा काम चलता था क्योंकि शादियाँ हर समय होती थीं, भले ही सर्दियों में शादियों की संख्या में बहुत बढ़ोतरी हो जाती थी। अब इस व्यापार में मंदी आ गई है। इस बात पर वह नाटकीय रूप से सिर हिलाकर कहते हैं, “कोरोनावायरस के कारण शादियों की दर में गिरावट आ गई है।”

व्यवसाय में गिरावट आने के बावजूद सादिक ने हाथ पर हाथ धर कर बैठे रहना ठीक नहीं समझा और सोचा कि वह अपने फूलों के व्यवसाय के लिए नया क्या कर सकते हैं। इस पर विचार करने के लिये और यह देखने के लिये कि दूसरे लोग इन विपरीत परिस्थितियों में जीवित रहने के लिए क्या-क्या प्रबंध कर रहे हैं और वह अपने स्कूटी से पास के ही करोल बाग बाजार पहुँच गये।

बाजार पहुँचने पर उन्होंने बारीकी से छोटी दुकानों और सड़क किनारे फुटपाथ पर लगे हुए स्टॉलस् को बारीकी से देखा और हो रहे कामों पर गौर किया। उन्होंने बताया, “बाजार की रौनक पहले की अपेक्षा आधी भी नहीं रह गई है, ऊर्जा मानो कहीं खो-सी गई है। मैंने बाजार को अच्छी तरह से देखा। अचानक मेरे दिमाग में एक आइडिया आया। मैंने अपने स्टॉल पर लोवर बेचने का फैसला लिया।”

सादिक ने अपनी मेहनत की कमाई से बचाई हुई कुछ नकदी एक सफ़ेद प्लास्टिक का पुतला खरीदने में निवेश की। साथ ही साथ कुछ लोवर और ट्रैक पैंट भी खरीदे। खुशी-खुशी सादिक इस निवेश के साथ अपने स्टॉल पर लौट आए। अब यह फूल प्लस लोवर की दुकान है, जो इस क्षेत्र में एक ही इस तरह के मेल का व्यवसाय है।

अभी सादिक कपड़ों के व्यवसाय में नये हैं और उन्हें बिना चेहरे के पुतले को लोवर पहनाने की कला में पारंगत में थोड़ा वक़्त लगेगा। सुबह का समय है और सूरज ऊपर नहीं आया है। आसपास बहुत ही कम लोग हैं। सादिक का फूलों का स्टॉल, एक तरफ से चाय की दुकान से और दुसरी तरफ से दर्जी की दुकान के बीच सिमटा हुआ है। स्टॉल मुख्य रूप से एक लकड़ी का तख्त है जिस पर फूल, धागे और एक गोदरेज की गुल्लक पहले से ही रखी हुई है। स्थानीय लोगों के लिए यह तख्त लोकप्रिय स्थान है। कुछ ही मिनटों के भीतर दो बुजुर्ग अखबारों के साथ आते हैं, तख्त के किनारे बैठते हैं और कोरोनावायरस और दूसरी बातें करना शुरू करते हैं।

सादिक ने बताया कि वह सुबह के वक़्त स्टॉल को केवल लोवर्स से ही तैयार करेंगे। इसके बाद वह तख्त पर इत्मीनान से बैठ गये और ताजे फूलों से भरे प्लास्टिक के बैगों को खाली करने लगे। रोजाना, यह फूल एक सप्लायर से खरीदे जाते हैं।

फूलों को प्लास्टिक बैग से निकालते हुए उनके चेहरे पर एक सम्मोहित मुस्कान चमक रही है, मानो कि दुनिया में फूलों के साथ खेलने के अलावा और कुछ इतनी खुशी देने वाला नहीं हो सकता। अपने होंठों के बीच एक गुलाब को दबा कर वह धागे का एक गोला उठाते हैं और भविष्य के बारे में एक अनिश्चितता के साथ एक निश्चय के बारे में कहते हैं, “मुझे नहीं पता कि कोरोनावायरस के जाने के बाद मैं लोअर का व्यवसाय जारी रखता हूँ या नहीं क्योंकि यह केवल एक साइड-बिजनेस है, लेकिन फूलों का व्यवसाय हमेशा करूँगा।”

इस दौरान, सफ़ेद पुतला तख्त पर अचल खड़ा रहा। उसके हाव-भाव किसी राष्ट्रीय संग्रहालय की प्राचीन मूर्तियों जैसे गम्भीर हैं।


Connect With US- Facebook | Twitter | Instagram

Leave a Reply

Your email address will not be published. Required fields are marked *