अपनी जान जोखिम में डालकर बचाई कोरोना मरीजों की जान, जानिए ऐसी दो कोरोना वाॅरियर्स के बारे में

meet Dr Zakia Syed and Dr Trupti Katdare Save the lives of corona patients by putting their lives at risk- Soochna
Image credit :Rediff News

इस कोरोनाकाल में हमने न जाने कितनी ऐसी घटनाएं देखी हैं, जिन्होंने हमें विपरीत परिस्थितियों से लड़कर आगे सिखाया है। आज हम दो ऐसी कोरोना वाॅरियर्स के बारे में बात करने वाले हैं, जो कई चुनौतियों के बावजूद कभी अपने काम से पीछे नहीं हटीं। यह कहानी है, इंदौर की दो बहादुर डाॅक्टरों की, जिनका नाम डॉ. ज़किया सैयद और डॉ. तृप्ति कटडारे है। ये दोनों डॉक्टर कोरोनावायरस की जांच करने के दौरान अपने ऊपर पत्थरबाजी होने के बावजूद अपने काम से पीछे नहीं हटीं, बल्कि पूरी मेहनत और लगन के साथ अपने काम में लगी रहीं।

पिछले महीने दोनों डाॅक्टरों को एक निंदनीय घटना का सामना करना पड़ा था। दोनों डाॅक्टर इंदौर के टाटपट्टी बाखल क्षेत्र में कोरोनावायरस की जांच करने के लिए अपनी टीम के साथ गई थीं। जब दोनों डाॅक्टर जांच के लिए एक महिला से बात कर रही थीं, तभी अचानक से भीड़ ने उनके ऊपर पत्थरों से हमला कर दिया, जिसके बाद दोनों डाॅक्टर जैसे- तैसे अपनी जान बचाकर वहां से निकल गईं। इसके बाद प्रशासन ने उस क्षेत्र में कड़ी कार्रवाई की और आरोपियों को पकड़ कर उन्हें सजा दी।

हमले के बावजूद दोबारा जांच करने गईं

डाॅ. तृप्ति ने बताया कि इस घटना के बाद हमारे चिंतित परिजनों ने हमें फोन किया और कहा कि हम यह सब भूल जाएं , हमारे जीवन से ज्यादा मूल्यवान कुछ भी नहीं है। लेकिन हमने कहा, ‘नहीं, यह समय भागने का नहीं है। लोगों, समाज और देश को इस समय हमारी जरूरत है। ऐसी निंदनीय घटना होने के बावजूद दोनों डाॅक्टर थोड़े समय बाद उस क्षेत्र में फिर से उन लोगों की जांच करने के गईं। बाद में क्षेत्र के लोगों ने उनसे माफी मांगी और कहा ”हमें मत छोड़ो। यह फिर कभी नहीं होगा।” अब परिदृश्य पूरी तरह से बदल गया है, वे लोग अब पूरी तरह से सहयोग करते हैं और अपनी मर्जी से स्क्रीनिंग और जांच के लिए आगे आते हैं।

मुश्किल में एक-दूसरे की ताकत बनीं दोनों डॉक्टर

डाॅक्टर तृप्ति ने बताया इस घटना के बाद, हम दोनों में से किसी ने नहीं कहा था कि हम वापस लौटेंगे, हम दोनों एक साथ डटे रहे। हम दोनों ने एक-दूसरे का मनोबल बढ़ाया और दोनों ने एक-दूसरे से नई ताकत और हौसला हासिल किया। डॉ. तृप्ति कहती हैं, ” ज़किया हमें हंसा-हंसाकर पागल कर देती है। हम दोनों ने कभी हार नहीं मानी है। अगर सैनिक देश के लिए लड़ सकते हैं, तो हम भी लड़ सकते हैं।” डॉ ज़किया ने कहा हैं, “कुछ लोगों ने हमें सैनिक भी कहा है।”

रमजान में भी पीछे नहीं हटीं डाॅ. ज़किया

डॉ. ज़किया सुबह 4 बजे उठती है और रमज़ान के दौरान सुबह-शाम भोजन के रूप में एक कप चाय के साथ ओट्स या स्नैक्स खाती हैं। शाम के समय वह डॉ. तृप्ति और अपनी COVID-19 टीम के तीसरे डॉक्टर डॉ. पीयूष के साथ अपना उपवास तोड़ती हैं। वे कमरे में इलेक्ट्रिक केतली में चाय बनाती हैं फिर चाय और सूखे स्नैक्स को एक साथ लेकर बैठती हैं। डॉ. ज़किया कहती हैं कि रोजा रखने से मेरे काम में कोई समस्या नहीं आई है। रोजा आपकी इच्छा शक्ति को मजबूत करता है, यह आपके शरीर और आत्मा दोनों को मजबूत बनाने का काम करता है। मैंने कभी कमजोर महसूस नहीं किया है और जब आपके बगल में आपका दोस्त होता है, तो आप कैसे थके हुए महसूस कर सकते हैं ?”

पुकारते रहे बच्चे ‘मम्मा, तुम घर कब आओगी?’

डाॅ. ज़किया को उनके पति ने कहा ”वे घर के बाहर आए ताकि वें और उनके बच्चे उन्हें देख सकें। डॉ. ज़किया ने आखिरी बार अपने पति और बच्चों को दो हफ्ते पहले देखा था। वह जब अपने घर के गेट के बाहर खड़ी थीं तो उनके पति के पास एक कप चाय थी। उनके बेटा और बेटी उनसे पूछते रहे , ‘मम्मा, तुम घर कब आओगी?’ डाॅ. तृप्ति ने कहा “मेरे पति मुझे प्रोत्साहित करते रहते हैं। अगर आपका परिवार आपके साथ हो तो आप किसी भी विपरीत परिस्थिति का सामना कर सकते हैं,”। डाॅ. तृप्ति अपने पति से 29 अप्रैल को अपने जन्मदिन के अवसर पर मिली थीं।

प्रशिक्षण केंद्र में दोनों मिली थीं पहली बार

डॉ. ज़किया सैयद और डॉ. तृप्ति कटडारे पहली बार 9 साल पहले युवा डॉक्टरों के रूप में अपने एक स्वास्थ्य प्रशिक्षण केंद्र के दौरान मिली थीं। मध्य प्रदेश ग्रामीण सरकार द्वारा संचालित सार्वजनिक स्वास्थ्य केंद्र में डॉक्टरों के रूप में उनकी नियुक्तियों का प्रशिक्षण एक महीने तक चला, लेकिन इसके बाद वें दोनों हमेशा के लिए बहुत अच्छी दोस्त बन गईं।


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