राष्ट्रीय शिक्षा नीति में 34 साल बाद हुए बड़े बदलाव, जानिए क्या है खास

भारत में शिक्षा प्रणाली को व्यवस्थित करने का काम वर्ष 1948 में डॉ राधाकृष्णन की अध्यक्षता में विश्वविद्यालय शिक्षा आयोग के गठन के साथ ही शुरु को हो गया था। वर्ष 1952 में लक्षमणस्वामी मुदलियार की अध्यक्षता में माध्यमिक शिक्षा आयोग और 1964 में दौलत सिंह कोठारी की अध्यक्षता में शिक्षा आयोग का गठन किया गया था, जिसके बिंदुओं के आधार पर 1968 में शिक्षा नीति पर एक प्रस्ताव प्रकाशित किया गया। इसके बाद 1986 में लागू हुई नीति में शिक्षा के एकरूपता पर जोर दिया गया, जिनका पालन 34 साल तक किया गया। 29 जुलाई 2020, गुरुवार को बड़े बदलावों के साथ नई शिक्षा नीति पूरे देश में लागू की गई।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986
वर्ष 1986 में राष्ट्रीय शिक्षा नीति का निर्धारण शिक्षा के चौतरफा विकास हेतु पूरे देश में प्राथमिक शिक्षा के स्तर में एकरूपता लाने के लिये हुआ था। समाज के सभी वर्गों के बच्चों के लिये प्राथमिक शिक्षा की सुविधा को आसान बनाने और बालिका शिक्षा पर विशेष जोर दिया गया था। नीति में देश के प्रत्येक जिले में नवोदय विद्यालयों की स्थापना करने और मुक्त विश्वविद्यालयों की स्थापना करने जैसे बिन्दु शामिल किये गये थे। इस शिक्षा नीति में उच्च शिक्षा एवं तकनीकी शिक्षा की प्रणाली को मजबूत बनाने के साथ लोगों को अधिक अवसर उपलब्ध कराने का संकल्प लिया गया था।

प्रोग्राम ऑफ़ ऐक्शन, 1992

वर्ष 1992 में प्रोग्राम ऑफ़ ऐक्शन (PoA), 1992 के तहत राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 1986 को संशोधित कर Common Minimum Programme की नई नीति अपनाई गई। इस नीति में देश के व्यवसायिक और तकनीकी कोर्स में प्रवेश लेने के लिये एक समान प्रवेश परीक्षा का सुझाव प्रस्तावित किया गया। भारत सरकार ने वर्ष 2001 में इन्जीनियरिंग और आर्किटेक्चर के कोर्स में प्रवेश के लिये तीन परीक्षा योजना लागू की। इसमें राष्ट्रीय स्तर पर JEE और AIEEE, वहीं राज्य स्तर पर SLEEE का विकल्प रखा गया।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति ड्राफ्ट, 2019

वर्ष 2019 में मानव संसाधन एवं विकास मंत्रालय ने नई शिक्षा नीति का ड्राफ्ट निकाला, जिसमें पाठ्यक्रम सामग्री को कम कर आवश्यक शिक्षण, समालोचक चिन्तन, चर्चा और विश्लेषण आधारित शिक्षा पर जोर दिया गया था। इसमें पुस्तक ज्ञान के साथ अन्य गतिविधियों पर ध्यान दिया जाना शामिल था। शैक्षणिक पढ़ाई के साथ व्यवसायिक पढ़ाई भी अनिवार्य की गई। नई परीक्षा पद्धति, जिससे छात्रों का तनाव कम हो, बनाने की बात की गई। शिक्षा की गुणवत्ता में सुधार लाने के लिये अस्थाई शिक्षकों की जगह योग्य और स्थाई शिक्षकों की भर्ती करने की बिन्दु भी शामिल किया गया। महाविद्यालयों में छात्रों को विषय चयन करने की स्वतंत्रता होगी। उनकी पढ़ाई की अवधि के हिसाब से उन्हें उचित डिग्री या डिप्लोमा प्रदान किया जायेगा। इस ड्राफ्ट पर लोगों से सुझाव और विचार माँगे गए थे। इस ड्राफ्ट पर दो लाख सुझाव आए थे।

राष्ट्रीय शिक्षा नीति, 2020

नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को लेकर पहले परामर्श प्रक्रिया चलाई गयी थी जिसमें लोगों से सुझाव माँगे गए थे। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने द्वारा राष्ट्रीय शिक्षा नीति 2020 को मंजूरी दिये जाने के बाद गुरुवार शाम 4 बजे औपचारिक रूप से इसकी घोषणा की गई। करीब 34 साल बाद आई शिक्षा नीति के द्वारा स्कूली शिक्षा से लेकर उच्च शिक्षा तक कई बड़े बदलाव किए गए हैं। इसमें वर्ष 2030 तक प्री-प्राइमरी से लेकर उच्चतर माध्यमिक तक 100 फीसदी का लक्ष्य और उच्च शिक्षा में 50 फीसदी प्रवेश दर हासिल करने का लक्ष्य रखा गया है। वहीं, मानव संसाधन विकास मंत्रालय (HRD) का नाम बदलकर शिक्षा मंत्रालय किया गया है।

नई शिक्षा नीति की प्रमुख बिन्दु

स्कूलों में 10+2 प्रणाली की जगह 5+3+3+4 प्रणाली लागू की जाएगी। पहले पाँच साल में प्री-प्राइमरी स्कूल के तीन साल और कक्षा एक और कक्षा 2 सहित फाउंडेशन स्टेज शामिल होंगे। नई शिक्षा नीति में प्री-प्राइमरी शिक्षा के लिए एक विशेष पाठ्यक्रम तैयार किया जाएगा। अगले तीन साल का स्टेज कक्षा 3 से 5 तक का होगा। इसके बाद 3 साल का कक्षा 6 से 8 तक का मिडिल स्टेज आयेगा। कक्षा छठी से छात्रों को जरूरी प्रोफेशनल शिक्षा दी जाएगी और स्थानीय स्तर पर इंटर्नशिप कराई जाएगी। चौथा स्टेज, कक्षा 9 से 12वीं तक का, 4 साल का होगा। इसमें छात्रों को विषय चुनने की आज़ादी रहेगी। पहले कक्षा 11 से विषय चुन सकते थे।

दसवीं एवं 12वीं की बोर्ड परीक्षाओं में बड़े बदलाव किए जाएंगे, जो साल में दो बार ऑब्जेक्टिव और डिस्क्रिप्टिव पैटर्न में होंगे। परीक्षा में मुख्य जोर ज्ञान के परीक्षण पर होगा ताकि छात्रों में रटने की आदत खत्म हो और उन बोर्ड परीक्षाओं का दबाव कम रहे।

नई शिक्षा नीति के अनुसार पाँचवीं तक और संभव हो सके तो आठवीं तक मातृभाषा में ही शिक्षा उपलब्ध कराई जाएगी। रिपोर्ट कार्ड का तीन स्तर पर आकलन हो कर बनेगा। पहले छात्र स्वयं अपने प्रदर्शन का आकलन करेंगे, दूसरी बार सहपाठी और तीसरी बार शिक्षक। सौ फीसदी नामांकन की नीति के जरिए पढ़ाई छोड़ चुके करीब दो करोड़ बच्चों को फिर दाखिला दिलाया जाएगा। शिक्षा का स्तर सुधारने के लिये शिक्षकों की भर्ती भी नये नियमों से की जाएगी। उन्हें नियमित ट्रेनिंग भी दी जाएगी।

स्कूली शिक्षा और उच्च शिक्षा के साथ कृषि शिक्षा, कानूनी शिक्षा, चिकित्सा शिक्षा और तकनीकी शिक्षा जैसी व्यावसायिक शिक्षा भी नई नीति के अन्तर्गत आयेंगी। कला, संगीत, शिल्प, खेल, योग, सामुदायिक सेवा जैसे सभी विषयों को सहायक पाठ्यक्रम नहीं कहा जाएगा और मुख्य पाठ्यक्रम में शामिल किया जाएगा। 

तीन भाषा फॉर्मूला में विद्यार्थियों को स्कूल के सभी स्तरों और उच्च शिक्षा में संस्कृत को एक विकल्प के रूप में चुनने का अवसर दिया जाएगा। किसी भी विद्यार्थी पर कोई भी भाषा नहीं थोपी जाएगी। माध्यमिक स्तर पर कोरियाई, थाई, फ्रेंच, जर्मन, स्पैनिश, पुर्तगाली, रूसी भाषाओं को शामिल किया जाएगा। 

नई नीति में उच्च शिक्षा में बहुस्तरीय प्रवेश एवं निकासी व्यवस्था (मल्टीपल एंट्री और एग्जिट सिस्टम) लागू की गई है। इसमें चार वर्ष के कोर्स में एक साल के बाद पढ़ाई छोड़ने पर सर्टिफिकेट, दो साल के बाद डिप्लोमा और 3-4 साल के बाद डिग्री मिल जाएगी। ऐसे छात्र जिन्हें हायर एजुकेशन नहीं लेना है या शोध में नहीं जाना है वह 3 साल की डिग्री कर सकते हैं और शोध में जाने वाले छात्रों को 4 साल की डिग्री करनी होगी। पाँच साल का संयुक्त ग्रेजुएट-मास्टर कोर्स लाया जाएगा। पोस्ट ग्रेजुएट कोर्स में एक साल के बाद पढ़ाई छोड़ने का विकल्प होगा। इसके साथ ही छात्र अपने पसंद के विषय का चयन कर सकते हैं।

यूजीसी, एआईसीटीई, एनसीटीई की जगह एक ही नियामक (रेगुलेटरी बॉडी) होगा। अगले 15 वर्षों में कॉलेजों को स्वशासित कर, विश्वविद्यालयों से संबद्धता की प्रक्रिया को पूरी तरह से खत्म कर दिया जाएगा। एमफिल का कोर्स नई शिक्षा नीति में निरस्त कर दिया गया है। अब छात्र ग्रेजुएशन, पोस्ट ग्रेजुएशन के बाद सीधे पीएचडी कर सकेंगे।

भविष्य में केंद्रीय विश्वविद्यालयों, राज्य विश्वविद्यालयों, डीम्ड विश्वविद्यालयों और प्राइवेट विश्वविद्यालयों के लिये सभी नियम एक समान बनाए जाएंगे। फीस पर नियंत्रण रखने के लिये भी एक तंत्र तैयार किया जाएगा। इसके साथ ही एससी, एसटी और ओबीसी स्टूडेंट्स के लिए नेशनल स्कॉलरशिप पोर्टल को बढ़ाया जाएगा। शिक्षा पर सरकारी खर्च जीडीपी 4.43 फीसदी से बढ़ाकर छह फीसदी तक करने का लक्ष्य रखा गया है।

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