आईएफएस अधिकारी सिद्धार्थ त्रिपाठी ने बदली झारखंड के दो पिछड़े गांवों की सूरत, ग्रामीणों को बनाया आत्मनिर्भर

झारखंड की राजधानी रांची से करीब 32 किलोमीटर दूर ओरमांझी प्रखंड में दो गांव हैं आरा और केरम। इन दोनों गांवों में रहने वाले करीब 600 लोग रोज सुबह 4.30 बजे लाउडस्पीकर की आवाज के साथ जगते हैं और अपने दिन की शुरुआत करते हैं। इसके बाद इन दोनों गांवों के लोग झाड़ू उठाकर अपने आसपास की जगहों की सफाई करते हैं। स्थानीय लोग इधर-उधर गंदगी फैलाने के बजाय बांस से कूड़ेदानों में कचरा डालते हैं, जिन्हें गांव की महिलाओं ने ही बनाया है। साफ-सफाई के बाद दोनों गांवों के कुछ लोग बच्चों के स्कूल जाने से पहले उन्हें पढ़ाते हैं और कुछ लोग अपने-अपने खेतों और अन्य कामों में जुट जाते हैं। आरा और केरम गांव के बीच सिर्फ दो किलोमीटर का फासला है। पहाड़ की तलहटी में बने रास्ते का आखिरी गांव है केरम, लेकिन कई मामलों में यह राज्य का आदर्श गांव है। इन गांवों की स्वच्छता और सौंदर्य ऐसा है कि ये शहरों को भी मात देते हैं। दोनों गांवों ने जल संरक्षण के दम पर गरीबी से भी करीब-करीब मुक्ति पा ली है।

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Image Credit : The Better India

आत्मनिर्भरता की मिसाल बने आरा और केरम

कभी आर्थिक रूप से पिछड़े और गरीबी व नशाखोरी से जूझ रहे आरा और केरम गांव आज आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुके हैं। 2017 में इस इलाके के एकमात्र पब्लिक स्कूल में सिर्फ दो शिक्षक थे, तब यहां के ग्रामीणों ने पैसे जुटाकर अपने ही गांवों के दो कॉलेज छात्रों को बच्चों की पढ़ाई में मदद करने के लिए नियुक्त किया और उन्हें 4000 रुपए महीने का वेतन भी दिया। उसी साल इन दोनों गांवों की महिलाओं ने नशाखोरी के खिलाफ अभियान चलाया। शराब के कारण इन गांवों के कई परिवार तबाह हो चुके हैं, लेकिन महिलाओं के प्रयास के कारण अब ये दोनों गांव नशामुक्त हो गए हैं। इसके अलावा स्थानीय प्रशासन ने इन गांवों की महिलाओं को सरकारी योजनाओं से जोड़ना शुरू किया। महिलाएं जागरूक हुईं, तो उन्होंने योजनाओं का लाभ लेना शुरू किया और देखते ही देखते इन दोनों गांवों की तस्वीर बदल गई।

जल संरक्षण के लिए बनाए 700 बांध

आरा और केरम गांव के लोगों ने जल संरक्षण के लिए स्वदेशी पद्धति लूज बोल्डर स्ट्रक्चर (एलबीएस) के जरिए करीब 700 बांध भी बनाए हैं जिनकी लागत 1.75 करोड़ रुपए है। करीब 180 ग्रामीणों ने 75 दिनों तक लगातार बिना रुके इन बांधों को बनाने का काम किया ताकि जल का संरक्षण हो सके, भूजल का स्तर बना रहे और मिट्टी का कटाव रोका जा सके। आरा और केरम गांव में शुरू हुई जल संरक्षण योजनाओं की वजह से यहां के लोगों को साल भर पानी मिलता है। गांव के लोगों ने पहाड़ों पर भी जल संरक्षण करने का इंतजाम किया है। इस पानी से वे साल भर खेती करते हैं और साथ में पशुपालन व मछली पालन भी करते हैं, जिससे उनकी कमाई कई गुना तक बढ़ गई है। आज इन दोनों गांवों में गरीबों की संख्या न के बराबर रह गई है। गांव के लोग अब रोजगार की तलाश में बाहर भी नहीं जाते और न ही वे किसी पर आश्रित हैं।

ग्रामीणों की औसत आमदनी पांच गुना बढ़ी

चार साल में इन दोनों गांवों के लोगों की औसत आमदनी पांच गुना तक बढ़ गई है। खेती के अलावा यहां के लोग डेयरी, पोल्ट्री फार्म और बकरी पालन भी करते हैं। कई ग्रामीणों के पास खुद की छोटी-मोटी दुकानें भी हैं। इन दोनों गांवों के कायाकल्प में ग्राम सभाओं ने भी अहम भूमिका निभाई है। इन ग्राम सभाओं में ग्रामीण गांव के सभी अहम मुद्दों और समस्याओं पर बातचीत करते हैं और उनका हल निकालते हैं। ग्राम सभाओं में महिलाओं की भी भागीदारी होती है। इसके अलावा गांव के लोग श्रमदान (विकास कार्यों में स्वैच्छिक भागीदारी) की भी अहमियत समझते हैं और इसमें बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

प्रधानमंत्री मोदी कर चुके हैं इन गांवों की तारीफ

इन दोनों गांवों की आत्मनिर्भरता और विकास की चर्चा इस कदर हो रही है कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने अपने मासिक रेडियो कार्यक्रम ‘मन की बात’ में भी आरा और केरम गांव की खूबियों का जिक्र किया था। उन्होंने इन गांवों में जल संरक्षण, जैविक खेती और नशामुक्ति को लेकर ग्रामीणों के सामूहिक प्रयास की दिल खोलकर तारीफ की थी। प्रधानमंत्री ने कहा था, ‘झारखंड में रांची से कुछ दूर, ओरमांझी प्रखंड के आरा-केरम गांव में, ग्रामीणों ने जल प्रबंधन को लेकर जो हौसला दिखाया है, वो हर किसी के लिए मिसाल बन गया है। ग्रामीणों ने श्रमदान करके पहाड़ से बहते झरने को, एक निश्चित दिशा देने का काम किया। वो भी शुद्ध देसी तरीके से। इससे न केवल मिट्टी का कटाव और फसल की बर्बादी रुकी है, बल्कि खेतों को भी पानी मिल रहा है। ग्रामीणों का ये श्रमदान, अब पूरे गांव के लिए जीवनदान से कम नहीं है।

आईएफएस सिद्धार्थ त्रिपाठी ने बदली गांवों की तस्वीर

झारखंड के इन दो पिछड़े गांवों की तस्वीर बदलने का श्रेय 1999 बैच के आईएफएस (भारतीय वन सेवा) अधिकारी सिद्धार्थ त्रिपाठी को जाता है। त्रिपाठी साढ़े चार साल से झारखंड में मनरेगा कमिश्नर के रूप में तैनात हैं। आईआईटी रुड़की से सिविल इंजीनियरिंग में मास्टर्स करने वाले त्रिपाठी आरा और केरम गांव के ग्रामीणों को अपना जीवन बदलने और आत्मनिर्भर बनने के लिए प्रेरित कर रहे हैं। त्रिपाठी बताते हैं, ‘2001 में चायबासा में पहली पोस्टिंग के दौरान मैंने अपनी जिंदगी में पहली बार इतनी गरीबी देखी, जिसके बारे में अब तक हम सिर्फ किताबों में पढ़ते थे। लोगों के पास बुनियादी सुविधाएं जैसे- पीने का पानी, स्वास्थ्य सेवा, शिक्षा और पौष्टिक आहार तक नहीं था।’ तीन साल पहले त्रिपाठी गांवों में कुछ प्रयोग करने के लिए पहुंचे थे, लेकिन ग्रामीण इसके लिए तैयार नहीं थे। हालांकि, उन्होंने अपनी नियमित यात्राओं और ग्रामीणों से बातचीत करके उन्हें मनाने में कामयाबी हासिल की।

सिद्धार्थ त्रिपाठी, IFS ऑफिसर
Image Credit : The New Indian Express

मेहनत और लगन से राह हुई आसान

आरा और केरम गांव में विकास की राह काफी मुश्किल रही। सिद्धार्थ त्रिपाठी के सामने कई चुनौतियां थीं, जैसे- ग्राम सभा को मजबूत करना और शराबबंदी करना ताकि पैसे की बचत हो सके। परिणामस्वरूप तीन साल में गांवों की औसत आय पांच गुना अधिक हो गई है। इस बारे में सिद्धार्थ त्रिपाठी कहते हैं, ‘गांवों को विकसित करने के लिए आपको अधिक धन की जरूरत नहीं है। आपको अपने समय का निवेश करने की जरूरत है। ग्रामीणों को एकजुट व संगठित करने और लोगों को शिक्षित करने की जरूरत है।’ आईएफएस सिद्धार्थ त्रिपाठी के हौसले, रचनात्मक बदलाव लाने के लिए उनके समर्पण, कड़ी मेहनत और दृढ़ विश्वास ने सैकड़ों ग्रामीणों की जिंदगी बदल दी है और उन्हें आत्मनिर्भर बनाया है। देश के दूसरे राज्यों को भी इन दो आत्मनिर्भर गांवों से सबक लेने की जरूरत है।


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