1963 में गलती से भारत में घुस आए थे चीनी सैनिक वांग ची, फिर यहीं बसा लिया घर-परिवार

भारत और चीन के बीच इन दिनों फैले तनाव के कारण देश में चीनी सामान के बहिष्कार की मांग उठ रही है। कोरोना वायरस फैलाने के लिए भी पूरी दुनिया में चीन की आलोचना हो रही है। इसी के बीच आज हम आपको एक ऐसे चीनी शख्स की कहानी बताने जा रहे हैं जो लंबे अरसे से हिंदुस्तान में फंसा हुआ है और अब उसने इसे ही अपना घर मान लिया है। इस शख्स का नाम है वांग ची। चीनी सेना का हिस्सा रहे वांग ची पिछले 57 साल से भारत में रह रहे हैं। 1963 से कई बार कोशिश करने के बाद वह पहली बार 2017 में चीन जा पाए। चीन पहुंचने के बाद वहां से वीजा लेकर वह 2018 में दूसरी बार भारत आए और फिर चीन लौट गए। साल 2018 में वांग तीसरी बार फिर भारत आए। इस बार उनका वीजा मार्च 2019 तक के लिए वैध था, लेकिन लॉकडाउन लगने के कारण हवाई सेवाएं बंद हो गईं और वांग ची चीन नहीं लौट सके। अब उन्होंने वीजा की वैधता बढ़ाने के लिए आवेदन किया है।

Image Credit : Dainik Bhaskar

1963 में गलती से घुसे थे भारतीय सीमा में

वांग ची की जिंदगी की कहानी पूरी फिल्मी है। 1962 में भारत-चीन के बीच हुई जंग में वह चीनी सेना में सर्वे करने की जिम्मेदारी संभाल रहे थे। उस वक्त इनकी उम्र सिर्फ 22 साल थी। जंग खत्म होने के बाद 1963 में वांग गलती से भारत की सीमा में घुस आए। उन्हें रेडक्रॉस की जीप दिखी तो उसमें सवार हो गए। सेना के जवान वांग ची को असम छावनी में ले आए। इसके बाद वांग 1963 से लेकर 1969 तक देश की अलग-अलग जेलों में रहे। उन्होंने अपना आखिरी ठिकाना मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले के तिरोड़ी गांव में बनाया। वांग के बेटे-बेटी समेत आधा परिवार मध्य प्रदेश में रहता है और उनके भाइयों का परिवार चीन में रहता है। भारत और चीन के बीच के मौजूदा तनाव पर वांग कहते हैं, ‘मुझे तो तिरोड़ी गांव में बहुत सहारा मिला। यहां के लोगों ने मुझे इतना प्यार दिया कि मैंने यहीं शादी की, यहीं बच्चे हुए और घर भी बनाया। हालांकि चीन जाकर बसने की तमन्ना अभी भी है।’

भारत में ही की शादी और बसाया घर परिवार

करीब सात साल तक देश की अलग-अलग जेलों में रहने के बाद भारत सरकार ने वांग को रिहा कर दिया और तिरोड़ी में ही रहने की इजाजत दे दी। सरकार ने वांग को हर महीने 100 रुपए की पेंशन भी दी। उनके छोटे बेटे विष्णु बताते हैं, ‘तिरोड़ी में पहले सेठ इंदरचंद जैन की गेहूं पीसने की दुकान थी, पिताजी वहीं काम करते थे। पापा के काम से खुश होकर उन्होंने ही 1974 में पापा की शादी गांव की एक लड़की सुशीला यानी मेरी मां से करवा दी।’ भारतीय लड़की से शादी होने के बाद सरकार ने वांग की पेंशन बंद कर दी। फिर उन्होंने थोड़े-थोड़े पैसे जोड़कर गांव में ही किराने की दुकान खोल ली। दुकान अच्छी चलने लगी तो उन्होंने मकान बना लिया और उनका परिवार भी बस गया। इस दौरान वांग लगातार चीन जाने की कोशिश में लगे रहे, लेकिन इजाजत नहीं मिली। काफी कोशिशों के बाद 2013 में वांग का पासपोर्ट बन पाया, लेकिन इसके बाद भी उन्हें काफी इंतजार करना पड़ा। 2017 में पहली बार वांग को परिवार के साथ चीन जाने की इजाजत मिली।

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वीजा की मियाद बढ़ाने के लिए किया आवेदन

57 साल के बाद भी वांग ची अभी तक चीन के ही नागरिक हैं। इसलिए अब वह वहां से वीजा लेकर भारत आते हैं, क्योंकि उनका परिवार यहां हैं। 2017 के बाद वो 2018 में फिर दो बार चीन गए। सितंबर 2019 में वह भारत लौटे थे। उनके वीजा की मियाद 2 मार्च 2020 को खत्म हो गई, लेकिन लॉकडाउन के कारण वे अब तक चीन नहीं जा पाए। वांग कहते हैं, ‘दोनों देशों के बीच अभी जो तनाव चल रहा है, उसे देखकर काफी बुरा लग रहा है। हम तो मिलकर रहना चाहते हैं।’ वांग के बेटे विष्णु ने बताया कि पिता का वीजा बढ़ाने के लिए आवदेन दिया है लेकिन अभी तक कुछ नहीं हुआ। वह चाहते हैं कि हमारा पूरा परिवार उनके साथ चीन में ही जाकर रहे। वहां पिताजी के तीन भाई हैं। खेती-बाड़ी है। विष्णु कहते हैं, ‘हम लोग तो यहीं पैदा हुए हैं। मेरे बड़े भाई की 25 साल की उम्र में ही मौत हो गई थी। बहन की शादी हो गई है। पिताजी को छोड़कर हमारे पूरे परिवार के पास भारत की नागरिकता है। सरकार से इजाजत मिलने पर 2017 में पहली बार हम तीन महीने के लिए चीन गए थे, इसके बाद नहीं जा पाए। वहां कभी भी किसी ने हमारे साथ गलत बर्ताव नहीं किया। हम तो बस यही चाहते हैं कि सीमा पर चल रहा तनाव खत्म हो जाए और दोनों देशों के लोग मिलजुलकर प्यार से रहें।’


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