शौर्य और पराक्रम का दूसरा नाम है बिहार रेजिमेंट, कई मौकों पर सिखाया है दुश्मनों को सबक

भारतीय सेना की बिहार रेजिमेंट इन दिनों काफी चर्चा में है। इस रेजिमेंट के वीर सपूतों ने बीते दिनों लद्दाख की गलवान घाटी में अपने शौर्य का परिचय दिया था। इस रेजिमेंट के 12 सैनिकों ने 15 जून को चीनी सैनिकों के साथ हुई भिड़ंत में देश की रक्षा के लिए बलिदान दिया। इनमें रेजिमेंट की 16वीं बटालियन के कमांडिंग ऑफिसर कर्नल बी संतोष बाबू भी शामिल थे। बिहार रेजिमेंट का एक गौरवशाली इतिहास रहा है। हिम्मत और बहादुरी में इसका कोई सानी नहीं है। करगिल युद्ध, मुंबई हमला और उरी सर्जिकल स्ट्राइक के बाद एक बार फिर इस रेजिमेंट ने अपना लोहा मनवाया है। देश के लिए जान की कुर्बानी देना बिहार रेजिमेंट की परंपरा रही है। इसकी शौर्य गाथाएं इतिहास में दर्ज हैं। बिहार रेजिमेंट के जवानों के अदम्य साहस के कारण ही वो किसी भी स्थिति को झेलने की क्षमता रखते हैं। इसीलिए इस रेजिमेंट के जवानों की तैनाती दुर्गम और जटिल परिस्थितियों वाले इलाकों में की जाती है। भारतचीन सीमा यानी एलएसी (LAC) पर गलवान घाटी और इस तरह के कुछ अन्य दुर्गम इलाकों में बिहार रेजिमेंट के जवान ही तैनात हैं।

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आजादी से पहले 1941 में बनी थी बिहार रेजिमेंट

बिहार रेजिमेंट की स्थापना साल 1941 में यानी देश की आजादी से पहले हुई थी। बिहार रेजिमेंट भारतीय सेना की सबसे पुरानी पैदल सेना रेजिमेंट में से एक है। इसका मुख्यालय पटना के पास दानापुर में है। बिहार रेजिमेंट सेंटर दानापुर देश की दूसरी सबसे बड़ी सैनिक छावनी है। फिलहाल बिहार रेजिमेंट के जवान 23 बटालियन के साथ देश की सेवा में जुटे हैं।

‘करम ही धरम’ है इसका मोटो

आजाद भारत में हुए तकरीबन सभी युद्धों में बिहार रेजिमेंट की टुकड़ियों ने हिस्सा लिया और अपने शौर्य के लिए कई पुरस्कार भी जीते। ‘वीर बिहारी’ के नाम से भी पुकारी जाने वाली इस रेजिमेंट ने संयुक्त राष्ट्र के शांति अभियानों के तहत सोमालिया और कांगो में भी भारत का प्रतिनिधित्व किया है। दूसरे विश्वयुद्ध, 1965 और 1971 के भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश के मुक्ति संग्राम में भी बिहार रेजिमेंट ने मिसाल पेश की। ‘करम ही धरम’ इस रेजिमेंट का मोटो रहा है, जिसके मुताबिक इस रेजिमेंट के जवान मातृभूमि के प्रति अपने कर्तव्य को ही अपना कर्म और धर्म मानते हैं। ‘जय बजरंग बली’ और ‘बिरसा मुंडा की जय’ जैसी हुंकार भरकर बिहार रेजिमेंट के जवान दुश्मनों पर टूट पड़ते हैं।

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दूसरे राज्यों के सैनिक भी इसमें शामिल

बिहार रेजिमेंट के नाम में बिहार जुड़ा होने के कारण बहुत से लोगों को लगता है कि इसमें सिर्फ बिहार के ही जवान होते हैं, जबकि ऐसा नहीं है। इसमें बिहार के अलावा भी दूसरे प्रदेशों से भी सैनिक चुने जाते हैं। इस रेजिमेंट के नाम के साथ भारतीय सेना के अतीत की बहुत सी कामयाबी की कहानियां जुड़ी हुई हैं, इसीलिए खास मौकों पर बिहार रेजिमेंट को ही याद किया जाता है। इस रेजिमेंट के खाते में बहुत से वीरता पुरस्कार और मेडल दर्ज हैं। भारत की आजादी से पहले ही इसके पास 5 मिलिट्री क्रॉस और 9 मिलिट्री मेडल थे। आजादी के बाद से अब तक इस रेजिमेंट को 7 अशोक चक्र, 9 महावीर चक्र और 21 कीर्ति चक्र, 70 शौर्य पदक सहित सेना के कई पुरस्कार और मेडल मिल चुके हैं।

करगिल युद्ध में दिखाया था शौर्य

भारतीय सेना में बिहार रेजिमेंट की शौर्यगाथा देश के लिए गौरव का विषय रही है। 1999 के करगिल युद्ध में इस रेजिमेंट के कैप्टन गुरजिंदर सिंह सूरी और मेजर मरियप्पन सरावनन ने पाकिस्तानी सैनिकों के छक्के छुड़ा दिए थे। इनकी वजह से पाकिस्तानी सेना को बटालिक सेक्टर के जुबर रिज से ही भागना पड़ा था। ये दोनों वीर सपूत इस जंग में शहीद हो गए थे। कैप्टन गुरजिंदर सिंह को मरणोपरांत महावीर चक्र और मेजर मरियप्पन को मरणोपरांत वीर चक्र से नवाजा गया था। इस जंग में बिहार रेजिमेंट के 18 जवान शहीद हुए थे, जिनकी याद में पटना के करगिल चौक पर एक स्मारक बनाया गया है।

संदीप उन्नीकृष्णन भी थे इसी रेजिमेंट का हिस्सा

2008 में मुंबई में हुए आंतकी हमले में शहीद हुए मेजर संदीप उन्नीकृष्णनन भी बिहार रेजिमेंट से ही थे। उन्हें प्रतिनियुक्ति पर एनएसजी में भेजा गया था। जब पाकिस्तानी आतंकियों के खिलाफ एनएसजी ने होटल ताज पैलेस में ऑपरेशन चलाया था तो मेजर संदीप वीरता से लड़ते हुए शहीद हो गए थे। उन्हें मरणोपरांत अशोक चक्र से सम्मानित किया गया था। इसी तरह 2016 में जम्मू-कश्मीर के उरी में पाकिस्तानी आतंकियों से लोहा लेते हुए बिहार रेजिमेंट के 15 जवान शहीद हुए थे।


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