दो बहनों ने शुरू किया 'रोज़ बाजार' नाम का स्टार्टअप, रोजाना लोगों के दरवाजे तक पहुंचाती हैं ताजे फूल

भारतीय संस्कृति में फूलों की बहुत अहमियत है। दुनिया के कई देशों में सुबह की शुरुआत अमूमन अखबार या चाय के साथ होती है, लेकिन भारत में ज्यादातर घर ऐसे हैं जहां लोगों का दिन पूजा-पाठ के साथ शुरू होता है और पूजा में खुशबूदार फूल न हों तो पूजा अधूरी मानी जाती है। वहीं कुछ लोग अपने दिन की शुरुआत घर में ताजे और महकते फूल सजाकर करते हैं। कुछ महिलाएं बालों में खूबसूरत और खुशबूदार फूलों के गजरे भी लगाती हैं। शादी, ब्याह जैसे कार्यक्रम भी फूलों के बिना फीके लगते हैं। फूलों की इसी अहमियत को समझते हुए बेंगलुरु में ‘रोज़ बाजार’ (Rose Bazaar) नाम का एक स्टार्टअप शुरू हुआ है जो इस बरसों पुरानी परंपरा को कायम रखने की कोशिश कर रहा है।

दो बहनों ने शुरू किया ‘रोज बाजार’ नाम का स्टार्टअप, रोजाना लोगों के घरों तक पहुंचाती हैं ताजे फूल- सूचना
Image Credit : Deccan Chronicle

बेंगलुरु की दो बहनों ने शुरू किया स्टार्टअप

इस स्टार्टअप को बेंगलुरु की दो बहनों यशोदा और रिया करुतरी ने शुरू किया है। उन्होंने 14 फरवरी 2019 को ‘रोज़ बाजार’ शुरू किया। इसके जरिए ऑनलाइन बुकिंग करने पर रोजाना ताजे फूल लोगों के घरों तक पहुंचाए जाते हैं। इस तरह दोनों बहनों ने अपने पारिवारिक बिजनेस को स्टार्टअप का रूप देकर लोगों की रोजमर्रा की जरूरत पूरी करने की पहल की। यशोदा और रिया करुतरी का जन्म बेंगलुरु में ही हुआ। शुरुआती पढ़ाई इथियोपिया में और आगे की पढ़ाई अमेरिका में हुई। यशोदा ने वाशिंगटन यूनिवर्सिटी से बिजनेस एडमिनिस्ट्रेशन और अकाउंटिंग में मास्टर्स किया वहीं रिया ने स्टैनफोर्ड यूनिवर्सिटी से साइंस, टेक्नोलॉजी एंड सोसायटी में बैचलर्स की पढ़ाई की। 1994 में यशोदा के जन्म के वक्त से ही फूल उनकी जिंदगी का अहम हिस्सा बन गए। उनके पिता ने गुलाब के फूलों के बाग का बिजनेस शुरू किया जोकि भारत, केन्या और इथियोपिया तक में फैला। दोनों बहनें बचपन से ही फूलों की खेती और उससे जुड़े व्यवसाय के बारे में सुनती आ रही थीं। इसी अनुभव से उनका आगे का रास्ता साफ होता गया। यशोदा और रिया बताती हैं, ‘हम शुरुआत से ही इस बात को लेकर स्पष्ट थे कि हम पढ़ाई के बाद भारत लौट आएंगे। यहां की उभरती हुई अर्थव्यवस्था ने हमें एक नई चीज शुरू करने को प्रेरित किया।’

कैसे आया ‘रोज़ बाजार’ का आइडिया

यशोदा करुतरी काफी पहले इस बात को लेकर क्लियर थीं कि वह किसी फ्लावर रीटेल शॉप में ही काम करेंगी। उन्होंने एक बार अपनी मां को तरह-तरह के फूलों के साथ पूजा करते देखा और तभी उन्हें यह आइडिया आया कि इस क्षेत्र में आगे बढ़ने की बहुत ज्यादा संभावना है। पूरी दुनिया में फूलों की खेती का बाजार करीब 370.4 मिलियन डॉलर का है। दुनियाभर के लोग उपहार में देने के लिए और सजावट के लिए फूलों का इस्तेमाल करते हैं, लेकिन यशोदा और रिया मानती हैं कि भारतीय परिवारों में फूलों की रोजाना की जरूरत इससे कहीं ज्यादा है। उन्होंने बताया, ‘भारत में काम करने के दौरान हमें इस बात का एहसास हुआ कि भारतीय लोग फूलों का इस्तेमाल अलग तरीके से करते हैं। यह एक ऐसी चीज है जो हमारी जिंदगी से जुड़ी हुई है और हमें रोजाना इसकी जरूरत पड़ती ही है।’ दोनों बहनों को यह बात तब समझ में आई जब वे गुलाब के निर्यात के अपने पारिवारिक बिजनेस से जुड़ी थीं।

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स्टार्टअप से पहले जुटाई जानकारी और संसाधन

यशोदा बताती हैं कि भारत के लोग पूजा के लिए गुलाब, चमेली, गेंदे और दूसरे तरह के फूलों का इस्तेमाल करते हैं। मंदिरों व सभी तरह के पूजा स्थलों में और वाहनों में भी भगवान पर चढ़ाने के लिए फूलों के हार का काफी इस्तेमाल किया जाता हैं। हमने लोगों की इसी जरूरत को समझा और यह काम शुरू किया। स्टार्टअप शुरू करने से कुछ महीने पहले उन्होंने अपने इस काम के बारे में जानकारी व संसाधन जुटाए। वे कई फूल विक्रेताओं से मिलीं और कई तरह के उत्पादों को परखा। इस दौरान उन्होंने यह भी जाना कि फूलों से जुड़ा व्यवसाय मांग और आपूर्ति के स्तर पर काफी बिखरा हुआ और असंगठित है। अपने स्टार्टअप को दूसरों से अलग बनाने के लिए यशोदा और रिया ने सब्सक्रिप्शन पर आधारित मॉडल बनाया है।

डुंजो और स्विगी पर भी होती है फूलों की बिक्री

‘रोज़ बाजार’ में फूलों की ऑनलाइन डिलिवरी के लिए मासिक सब्सक्रिप्शन कराया जा सकता है जोकि 600 रुपए से लेकर 1000 रुपए तक में उपलब्ध है। कंपनी की वेबसाइट के अलावा डुंजो और स्विगी जैसे ऑनलाइन प्लेटफॉर्म्स के जरिए भी फूलों की बिक्री की जाती है। फिलहाल यह स्टार्टअप हर महीने करीब 15000 ऑर्डर्स की डिलिवरी करता है। रिया कहती हैं, ‘हमारे पास कभी-कभी सुबह 6:30 बजे ही ग्राहकों के फोन आने लगते हैं कि वे फूलों का इंतजार कर रहे हैं। इसके बाद कुछ ही मिनट में उनके पास फूल पहुंचा दिए जाते हैं और ग्राहकों का फी़डबैक भी मिल जाता है। तब हमें एक सुखद एहसास होता है कि हम लोगों की कितनी बड़ी जरूरत पूरी कर रहे हैं।’


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